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मीर जाफर और जयचंद कौन जिनके नाम पर एक-दूसरे पर लांछन लगा रही बीजेपी-कांग्रेस?

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नई दिल्ली

राहुल गांधी के लंदन में दिए बयान पर संसद ठप है। बीजेपी ने दोटूट कहा है- राहुल को माफी मांगनी ही होगी। बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बीजेपी का संकल्प बताया। उन्होंने राहुल गांधी की तुलना भारतीय इतिहास के एक खलनायक मीर जाफर से की। बोले, जिस तरह मीर जाफर नवाब बनने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी से जा मिला, उसी तरह राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लिए विदेशों की मदद मांग रहे हैं। पात्रा ने कहा, ‘यह शहजादा नवाब बनना चाहता है, इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी से मदद मांग रहा है। राहुल गांधी आज के मीर जाफर हैं।’ बीजेपी प्रवक्ता के बयान पर कांग्रेस की तरफ से भी उतनी ही धारदार प्रतिक्रिया आई। मीरजाफर का जवाब जयचंद से दिया गया। पार्टी की तरफ से मोर्चा संभाला प्रवक्ता पवन खेड़ा ने। पात्रा पर प्रतिक्रिया में पवन बोले, ‘इतिहास में बीजेपी को जयचंदों की पार्टी के रूप में याद किया जाएगा।’ उन्होंने दावा किया कि बीजेपी जिनकी विचारधारा पर चलती है, वो तो अंग्रेजों से माफी मांगने वाले थे। तो आइए आज बात दोनों की कर लेते हैं- मीर जाफर और जयचंद की।

मीर जाफर कौन था?
पहले बात मीर जाफर की। इतिहास के विद्यार्थियों को तो पता होगा, लेकिन नई पीढ़ी के बाकी लोगों को शायद ही पता हो कि मीर जाफर कौन था? हालांकि, सोशल मीडिया के जमाने में वैराइटी की सूचनाओं का प्रवाह बहुत ज्यादा होता है। इस कारण कहीं, किसी मौके पर मीर जाफर की कहानी पता चल गई हो तो ठीक, वरना तो ज्यादातर लोग अनजान ही होंगे। ऐसे में अगर सत्ताधारी दल बीजेपी ने मीर जाफर का जिक्र किया तो उसके बारे में जानना जरूरी हो जाता है। दरअसल, मीर जाफर को प्लासी के युद्ध में ऐन वक्त पर पाला बदलने वाले गद्दार के रूप में याद किया जाता है। बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला का सामना ईस्ट इंडिया कंपनी से था। कंपनी भारतीय उपमहाद्वीप में अपने पांव जमाना चाह रही थी, लेकिन नवाब उसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा थे।

प्लासी के युद्ध में मीर जाफर ने की गद्दारी
मुट्ठीभर सेना के साथ नवाबा का सामना किया जाए तो कैसे? अंग्रेजों के सेनापति रॉबर्ट क्लाइव इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने में जुटा था। उसने गुप्तचरों को बंगाल भेजा। पता चला कि नवाब का सेनापति मीर जाफर की महत्वाकांक्षाएं हिलोरें मार रही हैं। वो खुद नवाब बनना चाहता है। बस क्या था। क्लाइव को अपने सवाल का जवाब मिल गया। उसने मीर जाफर को संदेश भिजवाया- आप हमारा साथ दीजिए, हम आपका साथ देंगे। तय हुआ कि सिराजुद्दौला को गद्दी से हटाना है। अंग्रेजों ने जून 1757 में बंगाल पर धावा बोल दिया। बंगाल उत्तर से अफगानी शासक अहमद शाह दुर्रानी और पश्चिम से मराठों के खतरों से घिरा था। अंग्रजों के अचानक हमले से नवाब सिराजुद्दौला भौंचक रह गए। वो उत्तर और पश्चिम में पर्याप्त सेना को छोड़कर कुछ टुकड़ियों के साथ अंग्रेजों से मुकाबले को चल पड़े। मुर्शिदाबाद से करीब 27 मील दूर प्लासी में नवाब की सेना ने डेरा डाला। 23 जून को 1757 को दोनों सेनाओं के बीच युद्ध शुरू हुआ। नवाब के सैनिकों मीर मदान और मोहनलाल की वीरता के आगे अंग्रेजों की सेना के पांव उखड़ने लगे। अंग्रेजी सैनिक पेड़ों के पीछे छिपकर जान बचाने को बेबस हुए। तभी मीर मदान को एक गोल लग गई और वो वीरगति को प्राप्त हो गए।

सिराजुद्दौला को मीर जाफर ने दिया धोखा
मीर मदान की मृत्यु से नवाब के सैन्य दल को बड़ा झटका लगा। नवाब ने मंत्रणा के लिए मीटिंग बुलाई। सेनापति मीर जाफर ने सुझाव दिया, अभी लड़ाई रोक दी जाए और वापस कैंप चला जाए। सेनापति के सुझाव पर नवाब ने सैनिकों को युद्ध भूमि से वापस बुला लिया। मीर जाफर की रणनीति काम कर गई। नवाब की सेना कैंप की तरफ लौट रही थी, तभी मीर जाफर चुपके से रॉबर्ट क्लाइव के पास पहुंच गया। उसने क्लाइव से कहा- काम हो गया। जाफर के कहने के मुताबिक, क्लाइव ने नवाब की लौटती सेना पर हमला करवा दिया। नवाब की सेना को इसकी आशंका नहीं थी, इसलिए सैनिक कुछ समझ नहीं पाए और इधर-उधर भाग खड़े हुए। नवाब सिराजुद्दौला हालात देखकर समझ चुके थे कि उनके साथ गद्दारी हुई। वो मीर जाफर और रॉबर्ट क्लाइव की नजरों से बचकर निकल गए।

मीर जाफर को मिला गद्दारी का इनाम
समझौते के मुताबिक, अंग्रेजों ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब नियुक्त कर दियाा। बाद में मीर जाफर के सिपाहियों ने पटना में सिराजुद्दौला को ढूंढ लिया। उन्हें पकड़कर मुर्शिदाबाद लाया गया। 2 जुलाई, 1757 को मीर जाफर के बेटे मीर मीरन के आदेश पर सिराजुद्दौला को फांसी पर लटका दे दिया गया। उस वक्त सिराजुद्दौला की उम्र महज 24 साल थी। जिस जगह सिराजुद्दौला को फांसी दी गई, उसे आज भी ‘नमक हराम की ड्योढ़ी’ कहा जाता है। मीर जाफर की नमक हरामी की इंतहा देखिए- युवा सिराजुद्दौला की लाश को अगले दिन हाथ पर रखकर पूरे मुर्शिदाबाद में घुमाया गया।

जयचंद और पृथ्वीराज की मशहूर कहानी
अब बात जयचंद की। जयचंद की कहानी थोड़ी अलग है। कन्नौज के राजा जयचंद राठौड़ गाहड़वाल वंश के शासक थे। उन्हीं की पुत्री थी संयोगिता जिन्हें दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने स्वयंवर से भगा लिया था। पृथ्वीराज और संयोगिता की प्रेम कहानी इतिहास में प्रसिद्ध है। एक दावा यह भी किया जाता है कि इसी प्रेम कहानी ने पृथ्वीराज और जयचंद की दुश्मनी गहरी कर दी। पृथ्वीराज अजमेर के राजा सोमेश्वर के बेटे थे। उनकी मां दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर की बेटी थीं। अनंगपाल को कोई पुत्र नहीं था। इस कारण उन्होंने अपने दामाद से पृथ्वीराज को मांग लिया। इस तरह पृथ्वीराज ने नाना की गद्दी संभाली और दिल्ली के राजा बन गए। यह बात 12वीं सदी की है। उसी वक्त अफगानिस्तान का मोहम्मद गोरी का पंजाब पर कब्जा हो चुका था।

जयचंद ने नहीं दिया था पृथ्वीराज का साथ
इतिहास गवाह है कि पृथ्वीराज चौहान ने गोरी को अलग-अलग लड़ाइयों में 16 बार धूल चटाया। फिर 1192 ई. में तराइन के युद्ध में दोनों का 17वीं बार आमना-सामना हुआ। इस बार पासा पलट गया और पृथ्वीराज हार गए। कहा जाता है कि बेटी संयोगिता को भगा ले जाने से नाराज जयचंद ने इस युद्ध में पृथ्वीराज का साथ नहीं दिया। हालांकि, एक दावा यह किया जाता है कि जयचंद ने तो मोहम्मद गोरी को बाकायदा भरोसा दिलाया था कि इस बार वह पृथ्वीराज का साथ नहीं देगा। यानी, जयचंद को गद्दार बताते हुए पृथ्वीराज पर आक्रमण करवाने का जिम्मेदार ठहराया जाता है।

जयचंद गद्दार या नायक?
पृथ्वीराज चौहान के राजकवि चंदबरदाई ने जयचंद को गद्दार बताया, लेकिन कन्नौज की एक संस्था कान्यकुब्ज सेवा समिति ने पिछले कई सालों से दुनियाभर के लोगों को न्योता दे रखा है कि जयचंद को गद्दार साबित करने पर इनाम दिया जाएगा। वर्ष 2005 में 51 हजार रुपये की इनाम की राशि घोषित हुई जो बढ़कर 5 लाख रुपये हो चुकी है। देश में इतिहास पर रिसर्च की सबसे बड़ी संस्था भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) के डायरेक्टर डॉ. ओमजी उपाध्याय ने भी पिछले वर्ष कहा था कि जयचंद ने गोरी को आक्रमण का न्योता दिया था, इसका इतिहास में कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं है। राजपूतों के इतिहास पर सबसे ज्यादा काम करने वाले कर्नल टॉड ने भी जयचंद की गद्दारी का कोई जिक्र नहीं किया है। वहीं, एक एनसीईआरटी की पुस्तक भी कहती है कि जयचंद हकीकत में एक नायक था, जिसने गोरी की सेना से लड़ते हुए अपनी जान दे दी थी। दरअसल, गोरी पृथ्वीराज को परास्त करके दिल्ली जीत लिया और कन्नौज की तरफ बढ़ा तो इटावा के पास जयचंद और उसकी सेना के बीच युद्ध हुआ। जयचंद वीरगति को प्राप्त हुए। भला गोरी को जयचंद का साथ मिला होता तो दोनों युद्ध क्यों करते?

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