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चीन की चालबाजी… अरुणाचल के 11 जगहों के नाम बदल फिर ठोका दावा

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नई दिल्ली,

चीन ने अरुणाचल प्रदेश पर अपने दावे को पुख्ता करने के मद्देनजर नया हथकंडा अपनाया है. उन्होंने तीन भाषाओं चीनी, तिब्बती और पिनयिन में अरुणाचल प्रदेश के नामों की तीसरी लिस्ट जारी की है. ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय ने रविवार को अरुणाचल प्रदेश के 11 स्थानों के नामों की लिस्ट जारी की. इन 11 स्थानों में दो भूमि क्षेत्र, दो रिहायशी इलाके, पांच पर्वती चोटियां और दो नदियां शामिल हैं.

‘नाम बदलने से तथ्य नहीं बदलता’
भारत पहले भी अरुणाचल प्रदेश के कुछ स्थानों के नाम बदलने के चीन के कदम को खारिज कर चुका है. भारत का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है और हमेशा रहेगा. अरुणाचल प्रदेश के नाम बदल देने से तथ्य नहीं बदलेगा. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने दिसंबर 2021 में कहा था कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब चीन ने अरुणाचल प्रदेश में इस तरह से स्थानों के नाम बदलने का प्रयास किया है. उन्होंने कहा था कि अरुणाचल प्रदेश हमेशा से भारत का अभिन्न अंग रहा है और रहेगा. अरुणाचल प्रदेश में स्थानों को गढ़े गए नाम देने से यह तथ्य नहीं बदल जाता.

पहली लिस्ट 2017 में जारी हुई थी
यह नामों की तीसरी लिस्ट है. इससे पहले 2017 में अरुणाचल प्रदेश के छह स्थानों के मानकीकृत नामों की पहली लिस्ट जारी की गई थी. 2017 में दलाई लामा के अरुणाचल प्रदेश दौरे के कुछ दिन बाद ही चीन ने पहली लिस्ट जारी की थी. चीन ने दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा की काफी आलोचना की थी. इसके बाद 2021 में चीन ने अरुणाचल के 15 स्थानों की दूसरी लिस्ट जारी की थी.

चीन में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने चीनी एक्सपर्ट्स के हवाले से रिपोर्ट में बताया कि अरुणाचल प्रदेश के नामों का ऐलान एक वैध कदम है. यह भौगोलिक नामों को मानकीकृत करने का चीन का संप्रभु अधिकार है.तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा के बाद 2017 में चीन द्वारा नामों की पहली सूची की घोषणा की गई थी. चीन ने उनकी यात्रा की काफी आलोचना की थी.

अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन के साथ लंबे समय से सीमा विवाद है. भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक, अरुणाचल प्रदेश की करीब 90 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर चीन अपना दावा करता है. जबकि, भारत की ओर से साफ किया जा चुका है कि अरुणाचल भारत का अटूट हिस्सा है और रहेगा. उसके बावजूद चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आता.

चीन के साथ क्या है सीमा विवाद?
चीन के साथ सीमा विवाद को समझने से पहले थोड़ा भूगोल समझना जरूरी है. चीन के साथ भारत की 3,488 किमी लंबी सीमा लगती है. ये सीमा तीन सेक्टर्स- ईस्टर्न, मिडिल और वेस्टर्न में बंटी हुई है.

ईस्टर्न सेक्टर में सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की सीमा चीन से लगती है, जो 1346 किमी लंबी है. मिडिल सेक्टर में हिमाचल और उत्तराखंड की सीमा है, जिसकी लंबाई 545 किमी है. वहीं, वेस्टर्न सेक्टर में लद्दाख आता है, जिसके साथ चीन की 1,597 किमी लंबी सीमा लगती है.चीन अरुणाचल प्रदेश के 90 हजार वर्ग किमी के हिस्से पर अपना दावा करता है. जबकि, लद्दाख का करीब 38 हजार वर्ग किमी का हिस्सा चीन के कब्जे में है. इसके अलावा 2 मार्च 1963 को हुए एक समझौते में पाकिस्तान ने पीओके की 5,180 वर्ग किमी जमीन चीन को दे दी थी.

1956-57 में चीन ने शिन्जियांग से लेकर तिब्बत तक एक हाईवे बनाया था. इस हाईवे की सड़क उसने अक्साई चिन से गुजार दी. उस समय अक्साई चिन भारत के पास ही था. सड़क गुजारने पर तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीनी राष्ट्रपति झोऊ इन लाई को पत्र लिखा. झोऊ ने जवाब देते हुए सीमा विवाद का मुद्दा उठाया और दावा किया कि उसके 13 हजार वर्ग किमी इलाके पर भारत का कब्जा है. झोऊ ने ये भी कहा कि उनका देश 1914 में तय हुई मैकमोहन लाइन को नहीं मानता.

क्या है ये मैकमोहन लाइन?
1914 में शिमला में एक सम्मेलन हुआ. इसमें तीन पार्टियां थीं- ब्रिटेन, चीन और तिब्बत. इस सम्मेलन में सीमा से जुड़े कुछ अहम फैसले हुए. उस समय ब्रिटिश इंडिया के विदेश सचिव हेनरी मैकमोहन थे. उन्होंने ब्रिटिश इंडिया और तिब्बत के बीच 890 किमी लंबी सीमा खींची. इसे ही मैकमोहन लाइन कहा गया. इस लाइन में अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा बताया गया था. आजादी के बाद भारत ने मैकमोहन लाइन को माना, लेकिन चीन ने इसे मानने से इनकार कर दिया. चीन ने दावा किया कि अरुणाचल दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा है और चूंकि तिब्बत पर उसका कब्जा है, इसलिए अरुणाचल भी उसका हुआ.

चीन क्यों नहीं मानता ये लाइन?
चीन मैकमोहन लाइन को नहीं मानता है. उसका कहना है कि 1914 में जब ब्रिटिश इंडिया और तिब्बत के बीच समझौता हुआ था, तब वो वहां मौजूद नहीं था. उसका कहना है कि तिब्बत उसका हिस्सा रहा है, इसलिए वो खुद से कोई फैसला नहीं ले सकता. 1914 में जब समझौता हुआ था, तब तिब्बत एक आजाद देश हुआ करता था. 1950 में चीन ने तिब्बत पर अपना कब्जा कर लिया था.

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