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नया हलफनामा देकर बोली केंद्र सरकार- राज्यों की राय भी जरूरी, CJI चंद्रचूड़ बोले- एक्सीलेंट

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नई दिल्ली

समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग वाली अर्जियों पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ 19 अप्रैल को दूसरे दिन भी सुनवाई कर रही है। बुधवार को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक नया हलफनामा दायर किया है और मांग की है कि इस मसले पर राज्य सरकारों की राय भी ली जानी चाहिए, क्योंकि विवाह का मामला संविधान की समवर्ती सूची में आता है।

केंद्र सरकार ने हलफनामें में क्या कहा?
केंद्र सरकार ने जो नया हलफनामा दायर किया है उसमें कहा है कि विवाह एक ऐसा मसला है, जो विधायिका के दायरे में आता है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि किसी भी फैसले से राज्यों के अधिकार प्रभावित होंगे। खासकर इस विषय पर कोई कानून बनाने से राज्यों के अधिकार में हस्तक्षेप होगा। ऐसे में उनकी राय जरूरी है।

19 अप्रैल को दूसरे दिन सुनवाई शुरू होते ही सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सीजेआई चंद्रचूड़ को बताया कि हमने (केंद्र सरकार ने) ऑन रिकॉर्ड एक दस्तावेज दिया है। केंद्र सरकार ने सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के चीफ सेक्रेटरी को इस मामले में पत्र लिखा है और उनकी राय मांगी है। इस पर सीजेआई ने कहा- एक्सीलेंट, तब तो राज्यों को इसकी जानकारी हो गई है।

केंद्र सरकार ने राज्यों को दी 10 दिन की मोहलत
उधर, 18 अप्रैल को डिपार्टमेंट ऑफ लीगल अफेयर्स ने सभी राज्यों के मुख्य सचिव को खत लिखा है और कहा है कि यदि उन्हें नोटिस नहीं भी मिलता है तो भी समलैंगिक विवाह के मसले पर अपनी राय से अवगत कराएं। केंद्र सरकार ने राज्यों को अपनी राय देने के लिए 10 दिन की मोहलत दी है। ताकि उनकी राय भी सुप्रीम कोर्ट में रखी जा सके।

राज्यों को क्यों शामिल करना चाहती है केंद्र सरकार?
समलैंगिक विवाह पर 18 अप्रैल को सुनवाई के पहले ही दिन केंद्र की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राज्यों का जिक्र किया था। उन्होंने दलील दी थी किसी को नहीं पता कि समलैंगिक विवाह के मसले पर सुदूर दक्षिण का कोई किसान क्या सोचता है या उत्तर भारत के किसी बिजनेसमैन की क्या राय है। यह ऐसा मसला है जो संसद के दायरे में आता है और संसद ही इस पर कोई फैसला ले सकती है।एसजी मेहता ने कहा था कि चूंकि विवाह समवर्ती सूची में है, ऐसे में यह भी संभव है कि कोई राज्य इसे माने और कोई न माने।

विवाह पर संविधान में क्या है प्रावधान?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में किसी व्यक्ति को अपनी पंसद के शख़्स से विवाह का अधिकार दिया गया है। भारतीय संविधान केवल एक पुरुष और महिला के बीच ही विवाह की अनुमति देता है। भारत में विवाह को लेकर चार तरह के कानून हैं; हिंदू मैरिज एक्ट, ईसाई मैरिज एक्ट, मुस्लिम मैरिज एक्ट और स्पेशल मैरिज एक्ट।

क्या है सुप्रीम कोर्ट की राय?
साल 2018 के बहुचर्चित शफीन जहां बनाम अशोक केएम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात को दोहराया था और कहा था कि अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह का अधिकार, संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्राप्त अधिकारों का हिस्सा है। इससे पहले साल 2017 में भी केएस पुट्टास्वामी बनाम भारतीय संघ केस में उच्चतम न्यायालय कह चुका है कि पारिवारिक जीवन के चुनाव का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग वाली जो 20 अर्जियां हैं, उनमें भी उच्चतम न्यायालय के इन फैसलों का जिक्र किया गया है।

 

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