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तीन लाख जवानों की कमी से जूझेगी आर्मी, चुनावी लाभ के ल‍िए सरकार ने लागू क‍िया OROP

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नई दिल्ली

OROP का पालन दुनिया का कोई भी देश नहीं करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे तात्कालिक चुनावी लाभ के लिए अपनाया थी। इसकी दीर्घकालिक लागत चौंका देने वाली है। ओआरओपी का वार्षिक बिल सेना के आधुनिकीकरण के लिए आवंटित धन से अधिक है। पिछले साल, ओआरओपी के कारण सरकार पर अतिरिक्त 25,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ा। इसके बाद सरकार को सेना के जवानों की संख्या कम करने पर विचार करना पड़ा। दिलचस्प है कि सरकार के इस विचार को Covid19 का साथ मिल गया।

चुनाव और धार्मिक सभाएं हुईं लेकिन भर्ती नहीं हुई
पूरे ढाई साल, जून 2022 तक कोई भर्ती नहीं हुई। भर्ती रैलियां उतनी ही संभव थीं जितनी कि चुनाव या कुंभ मेले जैसी धार्मिक सभाएं आयोजित करना। इस बीच, सरकार बहुप्रचारित अग्निवीर योजना पर काम कर रही थी, जिसका उद्देश्य एक तीर से दो शिकार करना था। पहला- मैनपावर कम करना, दूसरा-पेंशन बिल कम करना। जब पिछले साल अग्निवीर की घोषणा की गई, तो राजनेताओं ने पर्दे के पीछे से सेना के कंधे पर बंदूक रख गोली चलाई।

एक पूर्व थ्री-स्टार जनरल ने हाल ही में सेना में जवानों की लगातार हो रही कमी को इस प्रकार समझाया कि वेतन बिल के साथ-साथ पेंशन पर बचत महत्वपूर्ण है। अग्निवीर के माध्यम से जून 2022 में 40,000 सैनिकों की भर्ती शुरू हुई, जबकि 70,000 सैनिकों की सेवानिवृत्ति जारी रही। कॉम्बैट यूनिट्स पर जीरो भर्ती और लगभग तीन वर्षों तक सेवानिवृत्त होने वाले कर्मियों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। कई सैनिकों को लद्दाख में चीनी पीएलए के खिलाफ तैनात किया गया था। लेकिन किसी ने आवाज नहीं उठाई।

इस साल भी गोरखा जवानों की नहीं हुई भर्ती
नागरिक मानते हैं कि कोई युद्ध नहीं होगा। मैनपावर की कमी ने गोरखा रेजीमेंट को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है क्योंकि इस साल भी उनकी कोई भर्ती नहीं हुई है। दरअसल, नेपाल की सरकार अग्निवीर योजना पर निर्णय लेने में असमर्थ है। वहां की सरकार पुरानी व्यवस्था को तरजीह देती है, जिसके तहत 15 साल की नौकरी और पेंशन मिलता था।

इस मामले पर अंतिम निर्णय को नेपाली प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल की 31 मई को भारत यात्रा तक के लिए टाल दिया गया है। दहल द्वारा पीएम मोदी से नेपाल को अग्निवीर से छूट देने का आग्रह करने की संभावना है। नेपाल से गोरखा भर्ती के निलंबन या समाप्ति के गंभीर रणनीतिक परिणाम होंगे।

जवानों की संख्या कम करने के कारण?
2023, सेना में बदलाव का साल है। वर्तमान में 1,80,000 सैनिकों की कमी है। आने वाले समय में 1,00,000 और जवानों को कम किया जाएगा। पिछले महीने, इंटीग्रल डिफेंस स्टाफ के हेडक्वार्टर ने फोर्स में अतिरिक्त 10 प्रतिशत कटौती का आदेश दिया है।

सेना में जवानों की संख्या कम करने का एक कारण जम्मू और कश्मीर, विशेष रूप से बनिहाल के दक्षिण में उग्रवाद की स्थिति में काफी सुधार होना भी है। दिसंबर 2022 में, डीजी जम्मू-कश्मीर पुलिस दिलबाग सिंह ने दावा किया कि “एक जिले को छोड़कर जहां तीन से चार आतंकवादी हैं, जम्मू के सभी जिलों को आतंकवाद से मुक्त कर दिया गया है।”20 अप्रैल को जम्मू-पुंछ राजमार्ग पर एक आरआर ट्रक पर घात लगाकर हमला किया गया और दो सप्ताह बाद एक और घटना हुई। कुल 10 जवान शहीद हो गए। कम से कम दो राष्ट्रीय राइफल्स सेक्टरों को जम्मू से लद्दाख तक फिर से तैनात करना पड़ा।

आरआर बटालियन, जिनमें छह राइफल कंपनियां हैं, उनको चार कंपनियों तक कम किए जाने की संभावना है और आरआर सेक्टर मुख्यालयों को कोर मुख्यालय के तहत सीधे संचालित किया जा सकता है।पूर्वोत्तर में उग्रवाद से लड़ने वाली दो पर्वतीय डिवीजनों को राहत मिली है और आतंकवाद विरोधी मिशन अब असम राइफल्स के पास है। हालांकि मणिपुर जातीय संघर्ष एक चेतावनी है।

(अशोक के मेहता, भारतीय सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल हैं)

 

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