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समान नागरिक संहिता से क्या-क्या बदलेगा? उत्तराखंड के पैनल की रिपोर्ट से मिल रहे सुराग

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नई दिल्ली

समान नागरिक संहिता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान के बाद अचानक इस मुद्दे पर हलचल काफी तेज हो चुकी है। संसद के मॉनसून सत्र में इसे लेकर बिल पेश किया जा सकता है। इस बीच, कानून से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने अगले हफ्ते लॉ कमिशन और कानून मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों के साथ अहम बैठक बुलाई है। 3 जुलाई को संसदीय समिति 2 राउंड की बैठक करेगी। बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी 30 सदस्यों वाले इस संसदीय पैनल के अध्यक्ष हैं। पिछले साल इस पैनल ने गोवा के पुर्तगाली सिविल कोड की स्टडी के लिए वहां का दौरा किया था क्योंकि गोवा में पहले से समान नागरिक संहिता लागू है। 22वें लॉ कमिशन ने कुछ दिन पहले ही आम लोगों और धार्मिक संगठनों से समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर 30 दिनों के भीतर अपनी सलाह देने के लिए कहा है। वैसे उत्तराखंड सरकार ने यूसीसी के मुद्दे पर जिस पैनल का गठन किया था, उसकी रिपोर्ट तैयार हो चुकी है। उसकी सिफारिशें राष्ट्रीय स्तर पर समान नागरिक संहिता लागू करने में मददगार हो सकती हैं।

बीजेपी जबसे वजूद में आई तब से ही समान नागरिक संहिता उसके अहम अजेंडों में शामिल रहा है। जन संघ के जमाने से ये उसके चुनाव घोषणा पत्रों का हिस्सा रहा है। धर्म पर आधारित अलग-अलग पर्सनल लॉ की वजह से समान नागरिक संहिता लागू करना अपने आप में बड़ी चुनौती है। इसीलिए सरकार ने लॉ कमिशन को इसे लेकर डीटेल में सिफारिश देने को कहा था। समान नागरिक संहिता में क्या-क्या बदल सकता है, इसका क्लू उत्तराखंड सरकार के बनाए पैनल की रिपोर्ट से मिल सकता है।

हमारे सहयोगी अखबार इकनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, समान नागरिक संहिता पर बने उत्तराखंड के पैनल की सिफारिशों में सबसे अहम मुस्लिमों समेत सभी महिलाओं को संपत्ति में समान अधिकार की सिफारिश हो सकती है। इसके अलावा शादी के लिए महिलाओं की न्यूनतम उम्र 18 से बढ़ाकर 21 साल की जा सकती है। रिटायर्ड जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता वाले 5 सदस्यीय पैनल ने अपनी प्रमुख सिफारिशों को तैयार कर लिया है और कभी भी राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंप सकता है।

मुस्लिमों के सवाल
बेटियों को संपत्ति में अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था जिसके बाद हिंदू महिलाओं को पिता की संपत्ति में भी भाइयों जितना अधिकार सुनिश्चित हुआ। यूसीसी पैनल चाहता है कि ये अधिकार मुस्लिम महिलाओं को भी मिले। फिलहाल मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक बेटों को पिता की संपत्ति में बेटी की तुलना में दोगुनी हिस्सेदारी होती है।

पर्सनल लॉ के तहत कुछ समुदाय में एक से ज्यादा बीवियों या कुछ विशेष परिस्थितियों में एक से ज्यादा पतियों की इजाजत है। बहुविवाह खासकर मुस्लिमों और आदिवासियों में प्रचलित है। पैनल इसे खत्म करने की सिफारिश कर सकता है।मुस्लिमों से जुड़ा तीसरा अहम मुद्दा शादी की उम्र का है। पैनल पुरुषों की तरह महिलाओं के लिए भी शादी के लिए न्यूनतम उम्र 18 से बढ़ाकर 21 वर्ष करने की सिफारिश कर सकता है।

बच्चों को गोद लेना
सिर्फ हिंदू पर्सनल लॉ में बच्चे को कानूनी तौर पर गोद लेने और उन्हें बायोलॉजिकल बच्चों के समान अधिकार की इजाजत है। मुस्लिम, पारसी, यहूदी समेत दूसरे धर्म के लोगों को भी गार्जियंस ऐंड वार्ड्स ऐक्ट 1890 और जुवेनाइल जस्टिस (केयर ऐंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) ऐक्ट 2000 के तहत बच्चों को गोद लेने की इजाजत है। लेकिन गोद लिए गए बच्चों को जैविक संतानों की तरह अधिकार नहीं हैं। उत्तराखंड का यूसीसी पैनल सभी धर्मों के लिए गोद लेने से जुड़े नियम और गोद लिए बच्चों को जैविक संतानों के समान अधिकार की सिफारिश करने जा रहा है।

हिंदू पुरुषों के लिए
हिंदू संयुक्त परिवार के पुरुष उत्तराधिकारी को जन्म के साथ ही पैतृक संपत्ति में अधिकार का प्रावधान खत्म हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट 2005 के अपने आदेश से पहले ही हिंदू महिलाओं को भी पैतृक और कृषि संपत्ति में पुरुषों के समान अधिकार दे चुका है। ऐसे में हिंदू पुरुषों को पैतृक संपत्ति में एक्सक्लूसिव कोपार्सेनरी राइट्स खत्म किए जा सकते हैं।

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