नई दिल्ली
गृह मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति अडल्टरी यानी व्यभिचार को फिर से आपराधिक बनाने की सिफारिश कर सकती है। समिति अंग्रेजों के समय से चले आ रहे कानूनों में आमूल-चूल बदलाव के लिए प्रस्तावित विधेयकों- भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम का अध्ययन कर रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि व्यभिचार को आपराधिक बनाने के लिए जेंडर-न्यूट्रल प्रावधान रखे जाएंगे। इसी तरह समलैंगिक यौन संबंधों को फिर से आपराधिक बनाने की सिफारिश हो सकती है अगर वे बिना सहमति से हों तब। खास बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने अलग-अलग आदेश में व्यभिचार और समलैंगिक यौन संबंधों को गैर-आपराधिक घोषित किया है।
स्टैंडिंग कमिटी औपनिवेशिक युग के आपराधिक कानूनों में बदलाव के हिस्से के रूप में व्यभिचार कानून को फिर से अपराधिक बनाने और पुरुषों, महिलाओं और ट्रांस सदस्यों के बीच बिना-सहमति से यौन संबंधों को अपराध के दायरे में लाने की सिफारिश कर सकती है। संसदीय समिति इंडियन पेनल कोड (IPC), कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसेजर (CrPC) और इंडियन एविडेंस ऐक्ट को क्रमशः भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम में बदलने के लिए लाए गए विधेयकों पर विचार कर रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की तरफ से पेश किए गए इन विधेयकों को अगस्त में तीन महीने की समय सीमा के साथ आगे की जांच-परख के लिए बीजेपी सांसद बृज लाल की अध्यक्षता वाली गृह मामलों की स्थायी समिति को भेजा गया था।शुक्रवार को समिति की बैठक हुई, लेकिन विधेयकों पर मसौदा रिपोर्ट नहीं अपनाई गई क्योंकि विपक्षी सदस्यों ने तीन महीने के विस्तार के पक्ष में थे। अगली बैठक 6 नवंबर को होगी।
व्यभिचार पर क्या है समिति का रुख
मसौदा रिपोर्ट में यह सिफारिश किए जाने की उम्मीद है कि व्यभिचार को फिर से एक आपराधिक अपराध बना दिया जाए। इसके लिए तो 2018 में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से निरस्त कानून को बहाल किया जाए या फिर एक नया कानून पास किया जाए।
2018 में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की एक पीठ ने फैसला दिया था कि ‘व्यभिचार कोई अपराध नहीं हो सकता और नहीं होना चाहिए’। हालांकि बेंच ने कहा कि व्यभिचार तलाक के लिए आधार हो सकता है। तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा ने यह कहते हुए तर्क दिया था कि 163 साल पुराना, औपनिवेशिक काल का कानून “पति पत्नी का स्वामी है” की अवैध अवधारणा का पालन करता है।
उस समय कानून कहता था कि एक पुरुष जो एक विवाहित महिला के साथ, और उसके पति की सहमति के बिना यौन संबंध रखता है तो ये अपराध है। उसे दोषी पाए जाने पर 5 साल तक की सजा का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, महिला को दंडित नहीं किया जाएगा, सजा सिर्फ पुरुष को होगी।
रिपोर्ट में संभावना है कि व्यभिचार पर रद्द किए प्रावधान को वापस लाए जाने पर उसे जेंडर-न्यूट्रल यानी लिंग के आधार पर बिना भेदभाव वाला बनाने की सिफारिश की जाएगी। इसका मतलब है कि व्यभिचार की सूरत में पुरुष और महिला दोनों को सजा का सामना करना पड़ सकता है।अप्रकाशित मसौदा रिपोर्ट में कहा गया है, ‘विवाह संस्था की रक्षा के लिए, इस धारा (आईपीसी की धारा 497) को संहिता में जेंडर न्यूट्रल बनाकर रखा जाना चाहिए।’
आईपीसी की धारा 377 पर संसदीय समिति की राय
संसदीय समिति ने आईपीसी की धारा 377 पर भी चर्चा की है। ब्रितानी हुकूमत के दौर में बनी इस धारा के तहत समलैंगिकता को अपराध घोषित किया गया था। लेकिन 5 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया। सरकार ने अडल्टरी और समलैंगिक संबंधों को गैरआपराधिक बनाए जाने के विरोध के दलील दी थी। अब संसदीय समिति आईपीसी की धारा 377 के साथ-साथ 497 को भी पुनर्जीवित करने की सिफारिश कर सकती है।
समिति का तर्क है कि भले ही अदालत ने धारा 377 को संविधान के अनुच्छेद 14,15,19 और 21 का उल्लंघन माना लेकिन बिना सहमति से वयस्कों या बच्चों से गुदा मैथुन या फिर जानवरों के साथ यौन संबंध के मामले में 377 अब भी लागू होती है।
