नई दिल्ली,
राजधानी दिल्ली सहित पूरे एनसीआर में प्रदूषण से हालात दिन प्रतिदिन खराब होते जा रहे हैं. हवा इस कदर जहरीली हो गई है कि सांस लेने में तकलीफ हो रही है. यह पहली बार नहीं है जब दिल्ली में हवा इस कदर प्रदूषित हुई है. बीते कुछ सालों से यह समस्या गंभीर होते जा रही है और सर्दियों में यह अपने चरम पर पहुंच जाती है.
केंद्र से लेकर राज्य सरकारें, सुप्रीम कोर्ट, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसी अन्य एजेंसियां प्रदूषण से निपटने के लिए सक्रिय तो रही हैं लेकिन नतीजा सबके सामने है. साल-साल दर समस्या कम होने की बजाय बढ़ते जा रही है. दिल्ली के प्रदूषण पर भारत में तैनात अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने भी चिंता जताई है.
अमेरिकी राजदूत को आई लॉस एंजिल्स की याद
अमेरिका के लॉस एंजिल्स का उदाहरण देते हुए गार्सेटी ने कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम के दौरान कहा, ‘दिल्ली के मौजूदा दिन लॉस एंजिल्स में बीते उन दिनों की याद दिलाते हैं जब अमेरिका में सबसे प्रदूषित हवा हुआ करती थी. जहां हमें अपने शिक्षकों द्वारा चेतावनी दी गई थी कि आप बाहर खेलने के लिए नहीं जा सकते हैं ठीक वैसे ही आज मेरी बेटी को उसके शिक्षक ने दी, जब मैंने उसे स्कूल छोड़ा.’
कभी दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर था लॉस एंजिल्स
दरअसल गार्सेटी अमेरिका के जिस लॉस एंजिल्स शहर की बात कर रहे थे वो कभी दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर हुआ करता था. द्वितीय विश्व युद्ध से काफी पहले लॉस एंजिल्स में इतना भयंकर स्मॉग था कि लोगों को सांस लेने में दिक्कत होने लगी. 19वीं सदी की शुरूआत में एक दिन शहर को स्मॉग ने इस कदर चपेट में ले लिया कि यहां रहने वाले लोगों ने इसे सूर्य ग्रहण समझ लिया.
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1943 में यह समस्या और विकट हो गई. शहर की जनसंख्या और गाड़ियों की संख्या बढ़ने लगी. इसका नतीजा ये हुआ कि शहर धुंध की चादर में छिप गया. लोगों को सांस लेने, वॉक करने में दिक्कतें होने लगीं. प्रदूषित धुआं इतना घना और व्यापक था कि यहा विमानों की लैंडिंग तक पर “गंभीर खतरा” बन गया. मोनरोविया हवाई अड्डे के अधिकारियों ने कथित तौर पर परेशानी से बचने के लिए हवाई क्षेत्र को स्थानांतरित करने तक पर विचार कर लिया.
अमेरिकी राज्यों में प्रदूषण बना बीमारी की जड़
लॉस एंजिल्स की तरह कैलिफोर्निया में भी 1943 में भी जानलेवा स्मॉग फैला था जिसने अधिकारियों को अंदर तक झकझोर कर रख दिया. अक्टूबर 1943 में, लॉस एंजिल्स काउंटी बोर्ड ऑफ सुपरवाइजर्स ने इस समस्या से छुटकारा पाने के उपायों को तलाशा फिर लगातार इस दिशा में कदम उठाए. 1945 में घने धुएं के उत्सर्जन पर प्रतिबंध लगा दिया और वायु प्रदूषण नियंत्रण निदेशक का एक डेडिकेटेट ऑफिस तैयार किया जिसने धुआं उगलने वाले बिजली संयंत्रों, वाहनों और तेल रिफाइनरियों को नियंत्रित किया लेकिन इसके बावजूद धुंध बनी रही. इन सबके बीच डोनोरा और पेंसिलवेनिया में 1948 में कई लोगों की स्मॉग की वजह से मौत हो गई और लोग बीमार रहने लगे.
1950 के दशक की शुरुआत तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया था कि ऑटोमोबाइल स्मॉग का मुख्य कारण है या नहीं. तभी बायोऑर्गेनिक रसायन विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. एरी हागेन-स्मिट ने फोटोकैमिकल स्मॉग की प्रकृति और कारणों की खोज की. उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि ऑटोमोबाइल्स निकास के दो मुख्य घटक – गैसोलीन से वायुजनित हाइड्रोकार्बन, और आंतरिक इंजन द्वारा उत्पादित नाइट्रोजन के ऑक्साइड (एनओएक्स) स्मॉग के लिए जिम्मेदार हैं.
क्लीन एयर एक्ट
इसके बाद 1955 में जाकर अमेरिका ने इसके लिए एक पॉलिसी तैयार की और क्लीन एयर एक्ट को देश और संसद के समक्ष रखा. कई मुश्किलों के बाद इसे पारित कर 1963 में अधिनियमित किया गया और तब से कई बार संशोधित किया गया है. क्लीन एयर एक्ट (सीएए) हवा की गुणवत्ता से संबंधित अमेरिका का सबसे पहला कानून है. जिसका उद्देश्य देश भर में वायु प्रदूषण को कम करना और नियंत्रित करना है. यह अमेरिका के पहले और सबसे प्रभावशाली आधुनिक पर्यावरण कानूनों में से एक है.
कानून लागू होने से प्रदूषण में आई कमी
इस कानून का इंप्लीमेंटेशन इस तरह किया कि किया कि जिसका नतीजा लोगों को धीरे-धीरे मिलने लगा और 15 साल के अंदर वायु प्रदूषण 75 फीसदी के करीब कम हुआ और आज अमेरिका की हवा दुनिया में सबसे अधिक साफ है. प्रमुख अमेरिकी संघीय पर्यावरण कानूनों की तरह, क्लीन एयर एक्ट को देश, राज्य और स्थानीय सरकारों के तालमेल से अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) द्वारा लागू कराया गया.
ईपीए व्यापक प्रशासनिक नियम तय करता है तांकि कानून के आदेशों का पालन हो सके. राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानक कार्यक्रम बाहरी हवा में कुछ प्रदूषकों की सांद्रता के लिए मानक निर्धारित करता है और खतरनाक वायु प्रदूषकों की पहचान करता है. वहीं अन्य कार्यक्रम वाहन ईंधन, औद्योगिक सुविधाओं और उन अन्य तकनीकों की पहचान करते हैं जो वायु गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं. नए कार्यक्रम विशिष्ट समस्याओं से निपटते हैं, जिनमें अम्लीय वर्षा, ओजोन परत संरक्षण और जलवायु परिवर्तन शामिल हैं.
