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Wednesday, May 6, 2026
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माओ के ‘फाइव फिंगर’ के अधूरे सपने को पूरा करना चाहते हैं जिनपिंग, भारत आए भूटानी राजा करेंगे फेल?

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थिम्‍पू

भूटान के राजा लोटे शेरिंग एक बार फिर से भारत के दौरे पर हैं। भूटान भारत का सबसे करीबी साझीदार रहा है। राजा शेरिंग ऐसे समय में भारत आए हैं जब पिछले दिनों चीन और भूटान के बीच असुलझे बॉर्डर विवाद को लेकर हुई बातचीत एक समझौते पर खत्‍म हुई है। विशेषज्ञ राजा शेरिंग की यात्रा को कई बातों से जोड़कर देख रहे हैं। कुछ समय पहले भूटान की तरफ से भारत-चीन से लगे ट्राइजंक्‍शन को लेकर बड़ा बयान दिया गया था। अब जबकि वह भारत आए हैं तो समझा जा रहा है कि चीन को कहीं न कहीं एक बड़ा संदेश देने की कोशिश भी की जा रही है।

भूटान के राजा भारत में
पिछले दिनों चीन और भूटान के बीच अस्थिर सीमा पर नवीनतम दौर की वार्ता हुई है। यह वार्ता बॉर्डर को रेखाकिंत करने को लेकर बनाई गई एक नई ज्‍वॉइन्‍ट टेक्निकल टीम की जिम्मेदारियों और उसके कार्यों के बारे में समझौते के साथ खत्‍म हुई है। चीन मामलों के जानकार और भारत की राष्‍ट्रीय सुरक्षा परिषद के पूर्व सलाहकार रहे ब्रह्म चेलानी ने निक्‍केई एशिया में उनकी यात्रा का मतलब समझाया है। भूटान और चीन के बीच सन् 1984 से सीमा विवाद वार्ता जारी है। भूटान और चीन के बीच ज्‍वॉइन्‍ट टीम का गठन इस साल अगस्त में हुआ था। दोनों सरकारों के बीच हुए समझौते के तहत इसे बनाया गया था। इसके बदले में सीमा वार्ता में तेजी लाने के लिए साल 2021 के समझौता ज्ञापन का पालन किया गया। हालांकि, समझौते के बावजूद, चीन और भूटान के बीच सीमा विवाद फिलहाल नजर नहीं आता है।

भूटान पर भी कब्‍जे की कोशिश
भारत की ही तरह दोनों देशों के बीच सीमा विवाद एक संवेदनशील मसला है। सन् 1949 की मित्रता संधि के तहत, भूटान ने अपने बाहरी संबंधों के संबंध में भारत सरकार की सलाह पर आगे बढ़ने की कसम खाई थी। सन् 2007 की एक संधि हुई और जिसमें बदलाव हुआ। इसके तहत वादा किया गया कि दोनों देशों अपने राष्ट्रीय हितों से संबंधित मुद्दों पर एक-दूसरे के साथ मिलकर सहयोग करेंगे। इस वादे के साथ ही संधि को फिर से परिभाषित किया गया था। भूटान में, चीन उसी तरह एक रणनीतिक पकड़ बनाना चाहता है जैसा उसने नेपाल में किया है। नेपाल के भी भारत के साथ मजबूत संबंध हैं। नेपाल में हाल के वर्षों में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है।

माओ का एक सपना
दरअसल चीन के राष्‍ट्रपति अब भूटान के साथ मिलकर उस सपने को पूरा करने में लगे हैं जो माओ ने देखा था। माओ तिब्बत को चीन के दाहिने हाथ की हथेली मानते थे। बदले में, उन्होंने उस हाथ की ‘उंगलियों’ को देखा, जो समय आने पर भारतीय क्षेत्र के तौर पर भूटान, नेपाल और लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश से आजाद हो जाएंगी। हाल के वर्षों में पांच उंगलियों की सीमा पर चीनी घुसपैठ से पता चलता है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग माओ के विस्तारवादी दृष्टिकोण को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं। माओत्से तुंग ने सन् 1951 में तिब्बत पर कब्जा किया था। इसके धर्म और संस्कृति ने भूटान के समाज को एक आकार दिया। साथ ही चीन को भूटान के साथ-साथ नेपाल और भारत का पड़ोसी बना दिया।

भूटान के राजा का बड़ा बयान
चीन ने पहले उत्तरी भूटान में अपने कब्जे वाले क्षेत्रों से हटने की इच्छा का संकेत दिया है। इसमें बेयुल खेनपाजोंग की पवित्र मठ-समृद्ध घाटी भी शामिल है। लेकिन तभी जब भूटान अपनी कुछ पश्चिमी सीमाएं छोड़ेगा तो। दूसरी ओर भूटान भारतीय हितों का सम्मान करने के लिए संधि से बंधा हुआ है। भारत, विशेषकर डोकलाम पठार के आसपास, भूटानी क्षेत्र चीन को सौंपने का विरोध कर रहा है। इसलिए जब भूटान और चीन अपनी बातचीत को आगे बढ़ाने के बारे में अधिक समृद्ध समझौतों पर पहुंच सकते हैं। लेकिन फिर भी इसका अंत दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा है। शेरिंग ने भी एक इंटरव्‍यू में कहा था, ‘समस्या का समाधान अकेले भूटान पर निर्भर नहीं है। हम तीन हैं।’

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