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हम घर लौटना चाहते हैं… रूस के लिए लड़ रहे नेपाली गोरखा सैनिकों ने बताई भयावह कहानी

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काठमांडू

रूस की सेना का हिस्सा बनकर यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में लड़ रहे नेपाल के कई जवानों ने बताया है कि किस तरह की मुश्किलों का वह सामना कर रहे हैं। वह जिंदगी को जोखिम में डालकर वहां से निकलने की कोशिश में हैं। अल जजीरा ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कैसे जनवरी के महीने में यूक्रेन के जापोरीजिया क्षेत्र से नेपाल के बिमल भंडारी ने रूसी सेना को छोड़कर निकलने के लिए जान जोखिम में डालकर अपना सफर शुरू किया। अपने एक साथी के साथ भंडारी ने वहां से निकलने की कोशिश की। भंडारी एक रिश्तेदार के माध्यम से रूस में एक नेपाली एजेंट के संपर्क में था। एजेंट और एक अन्य तस्कर ने वादा किया कि वे भागने की योजना बना सकते हैं। इसके लिए उनसे मोटी रकम भी ली गई लेकिन वह इस कोशिश यूक्रेन की सीमा पर रूसी सेना के हत्थे चढ़ गया। उसका पासपोर्ट जब्त करते हुए उसकी बीमारी को देखते हुए उसे कड़ी निगरानी में अस्पताल भेज दिया गया।

भंडारी ने अपने अस्पताल के बिस्तर से अल जजीरा को बताया, इस क्रूर युद्ध से बचने का यह हमारा एकमात्र मौका था और हम असफल रहे। मैं अस्पताल में हूं और ठीक नहीं होना चाहता क्योंकि स्वस्थ होते ही मुझे युद्ध में सबसे आगे की लाइन में धकेल दिया जाएगा। यह एक ऐसा डर है जो सैकड़ों नहीं तो दर्जनों नेपाली परिवारों को परेशान कर रहा है। नेपाल सरकार के पास रूस के लिए भाड़े के सैनिकों के रूप में लड़ने वाले देश के नागरिकों की सटीक संख्या नहीं है, लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है कि उनकी कुल संख्या एक हजार तक हो सकती है। इनके परिवार धैर्य खो रहे हैं और लगातार काठमांडू में रूसी दूतावास के बाहर प्रदर्शन करते हुए मांग कर रहे हैं कि उनके लोगों को वापस भेजा जाए।

नेपाली शेल्टर की तरह हो रहे इस्तेमाल
नेपाल से गए इन रंगरूटों का कहना है क तस्करों ने उनको तीन महीने की ट्रेनिंग देने की बात कही थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ उन्हें यूक्रेन की सीमा से लगे दक्षिण-पश्चिमी रूस के रोस्तोव क्षेत्र में एक महीने से भी कम समय का युद्ध अभ्यास मिला और युद्ध में उतार दिया गया। युद्ध में घायल होने के बाद अस्पताल में भर्ती कार्की नाम के जवान का कहना है कि उनकी यूनिट के अधिकारी ज्यादातर नेपाली, ताजिक और अफगान लड़ाकों को आगे की लाइन में भेजते हैं। रूसी हमें बस पीछे से आदेश देते हुए हमारा ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं।

नेपाल से जाकर रूस की सेना में शामिल हुए एक और शख्स ने कहा कि रूसी कमांडर हमें दुश्मन के ठिकानों का निरीक्षण करने के लिए भी कहते हैं, जो बहुत डरावना है। इतना ही नहीं बहुत से ऐसे लोग भी हैं, जिनको कई-कई महीने का वेतन नहीं दिया गया है। ये भी एक बड़ी वजह है कि ये लोग किसी भी तरह वहां से वापस घर आना चाहते हैं। दूसरी ओर जो लोग मर गए हैं, उनके शव लाने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं मुआवजा के लिए भी नेपाल में उनके परिवार भटक रहे हैं।

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