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‘जांच में सहयोग नहीं कर रहे बिभव कुमार, गवाहों को कर सकते हैं प्रभावित’, SC में बोली दिल्ली पुलिस

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नई दिल्ली,

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के निजी सचिव बिभव कुमार द्वारा दायर जमानत याचिका पर अपना जवाब दाखिल कर दिया है. पुलिस ने कोर्ट को बताया कि बिभव कुमार ने जांच में सहयोग नहीं किया और वह सवालों के जवाब देने में भी टालमटोल कर रहे थे.

पुलिस ने अदालत को बताया कि बिभव कुमार गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं या सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं. दिल्ली पुलिस द्वारा अदालत को दिए हलफनामे के मुताबिक, इस मामले में लंबे वक्त तक कैद में रहना जमानत का आधार नहीं है. उन्होंने (बिभव) ने अपना मोबाइल फोन फॉर्मेट कर दिया है. उनके इस फोन में घटना से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी हो सकती हैं.

‘पीड़िता की मानसिक स्थिति पर पड़ा घटना का असर’
दिल्ली ने दलील दी है कि इस घटना से पीड़िता सांसद स्वाति मालीवाल की मानसिक स्थिति पर काफी गहरा असर पड़ा है, जिसके कारण उन्हें चार दिनों तक अपने घर में ही कैद होकर रहना पड़ा. दिल्ली के मुख्यमंत्री के निजी सचिव द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई जमानत याचिका पर सात अगस्त को सुनवाई करते हुए जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने नोटिस जारी कर पुलिस को 21 अगस्त तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था.

HC के फैसले को दी चुनौती
बता दें कि बिभव कुमार ने दिल्ली हाईकोर्ट के 12 जुलाई के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था. उन्होंने कहा था कि आरोप झूठे हैं और जांच पूरी होने के बाद ही उन्हें हिरासत में रखा जाना चाहिए. अदालत ने घटना की बारीकियों का हवाला देते हुए संकेत दिया कि चिंता सिर्फ चोटों की गंभीरता में नहीं है, बल्कि आरोपों में भी है.

क्या है मामला
स्वाति मालीवाल पर हमला कथित तौर पर 13 मई को मुख्यमंत्री केजरीवाल के आधिकारिक आवास पर हुआ था, जिसके बाद 16 मई को कुमार के खिलाफ विभिन्न आईपीसी धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी. बिभव कुमार को दो दिन बाद 18 मई को गिरफ्तार किया गया था.

दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले बिभव कुमार को जमानत देने से इनकार कर दिया था, जिसमें उनके “काफी प्रभाव” और अगर उन्हें रिहा किया जाता है तो गवाहों को प्रभावित करने के संभावित जोखिम का हवाला दिया गया था. अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उनकी जमानत को उचित ठहराने के लिए कोई ठोस आधार पेश नहीं किया गया है.

 

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