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‘जमानत नियम और हिरासत अपवाद’, PMLA से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने खींच दी न्याय की लकीर

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नई दिल्ली,

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद है” का सिद्धांत धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत धन शोधन के मामलों पर भी लागू होता है. अदालत का यह फैसला तब आया जब उसने धन शोधन के एक मामले में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के कथित सहयोगी प्रेम प्रकाश को जमानत दे दी, जबकि हाई कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने फिर दोहराया है कि भारतीय न्याय प्रक्रिया में जमानत नियम है और हिरासत यानी कैद अपवाद है. ये नियम PMLA में भी लागू होगा. इसका मतलब, ‘जमानत नियम है, जेल अपवाद’ का सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत भी मौलिक अधिकार का हिस्सा है.

‘अधिकारी के सामने आरोपी का बयान सबूत नहीं…’
जस्टिस भूषण आर गवई, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्र और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि कानून की समुचित प्रक्रिया का पालन करते हुए ही किसी नागरिक को आजादी के बुनियादी अधिकार से वंचित किया जा सकता है. PMLA के तहत हिरासत के दौरान कोई आरोपी जांच अधिकारी के सामने कोई अपराध स्वीकार कर बयान देता है तो उसे अदालत में सबूत नहीं माना जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के कथित सहयोगी प्रेम प्रकाश को भी जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है. प्रेम प्रकाश को जमानत देते हुए, अदालत ने उनकी लंबी कैद और बड़ी संख्या में गवाहों के कारण मुकदमे में हुई देरी को ध्यान में रखा.

जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा, “मनीष सिसोदिया मामले में दिए गए फैसले पर भरोसा करते हुए हमने कहा है कि पीएमएलए में भी जमानत एक नियम है और जेल अपवाद है. व्यक्ति की आजादी हमेशा नियम है और कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत वंचना अपवाद है.”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हमारा मानना ​​है कि अगर अपीलकर्ता के बयान अपराध सिद्ध करने वाले पाए गए तो उन पर धारा 25 के तहत कार्रवाई की जाएगी. बयान को केवल इसलिए स्वीकार्य बनाना हास्यास्पद होगा क्योंकि वह उस समय एक अन्य ईसीआईआर (प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट) के लिए हिरासत में था. ऐसे बयानों को स्वीकार्य बनाना बेहद अनुचित होगा क्योंकि यह न्याय के सभी सिद्धांतों के खिलाफ होगा.”

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