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‘क्षेत्रीय भाषाओं में मिले कानूनी शिक्षा ताकि वकील अपनी मातृभाषा में बहस कर सके…’, CJI चंद्रचूड़ ने कही बड़ी बात

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नई दिल्ली

भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने शनिवार को क्षेत्रीय भाषाओं में कानूनी शिक्षा की वकालत की। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा होगा नागरिकों को उनकी समझ में आने वाली भाषा में कानूनी समझ होगी। डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि मैं केवल यह आशा करता हूं कि अब हमारे पास हर क्षेत्रीय भाषा में कानूनी शिक्षा होगी ताकि हम वकीलों के नए ग्रुप तैयार कर सकें जो अदालतों के समक्ष बहस करने और न्याय को बढ़ावा देने के लिए अपनी मातृभाषा में अच्छी तरह से पक्ष रख पाएं।

चंद्रचूड़ ने कही बड़ी बात
न्यायपालिका में टेक्नोलॉजी को अपनाने के बारे में बताते हुए मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त हर भाषा में अनुवाद किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि 73,000 अनुवादित निर्णय सार्वजनिक दायरे में हैं। उन्होंने बताया कि जिला न्यायपालिका न्याय की तलाश में एक नागरिक के लिए संपर्क का पहला बिंदु है।

सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा, “कई नागरिक कानूनी प्रतिनिधित्व का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। उनमें जागरूकता की कमी है और अदालतों तक पहुंचने में कठिनाइयां हैं। हमारे काम की गुणवत्ता और वे परिस्थितियां, जिनमें हम नागरिकों को न्याय प्रदान करते हैं, यह निर्धारित करती हैं कि उन्हें हम पर भरोसा है या नहीं और यह समाज के प्रति हमारी अपनी जवाबदेही की परीक्षा है। इसलिए जिला न्यायपालिका को जबरदस्त जिम्मेदारी निभाने के लिए कहा जाता है और इसे उपयुक्त रूप से ‘न्यायपालिका की रीढ़’ भी कहा जाता है।”

न्यायाधीशों की भूमिका पर बोले चंद्रचूड़
न्यायाधीशों की भूमिका पर चंद्रचूड़ ने कहा, “प्रत्येक न्यायाधीश में न केवल अदालत में पेश होने वाले वकीलों के जीवन को, बल्कि हमारे समाज के वर्तमान और भविष्य को बदलने की क्षमता है। लेकिन ऐसा करने के लिए हमें न्यायाधीशों के रूप में यह एहसास होना चाहिए कि हम अपने अस्तित्व से परे कारणों से मौजूद हैं। हमारे कार्य का मूल उद्देश्य दूसरों की सेवा करना है। ऐसा तब हो सकता है जब हम खुद को उन लोगों के स्थान पर रखें जो वास्तविक जीवन में पीड़ा और अन्याय की कहानियां लेकर हमारे सामने आते हैं।”

चंद्रचूड़ ने कहा कि न्यायाधीशों की विभिन्न जिम्मेदारियां असाधारण चुनौतियां भी लाती हैं। उन्होंने कहा कि एक न्यायाधीश के लिए उस पीड़ा के वास्तविक चेहरे से प्रभावित न होना मुश्किल है, जिसका सामना हममें से प्रत्येक व्यक्ति हर दिन करता है।

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