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Tuesday, March 10, 2026
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मस्जिद के अंदर ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने से धार्मिक भावनाएं आहत नहीं होतीं: हाईकोर्ट

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नई दिल्ली,

कर्नाटक हाईकोर्ट ने मस्जिद के अंदर ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने के आरोप में दो लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इससे ‘किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंची.’ यह आदेश पिछले महीने पारित किया गया था और मंगलवार को कोर्ट की साइट पर अपलोड किया गया. शिकायत के अनुसार, दक्षिण कन्नड़ जिले के दो लोग पिछले साल सितंबर में एक रात वहां के एक मस्जिद में घुसे और ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए.

हाई कोर्ट पहुंचे आरोपी
इसके बाद स्थानीय पुलिस ने उन पर भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया, जिसमें धारा 295 ए (धार्मिक विश्वासों को ठेस पहुंचाना), 447 (आपराधिक अतिक्रमण) और 506 (आपराधिक धमकी) शामिल हैं. आरोपियों ने अपने खिलाफ लगे आरोपों को खारिज करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उनके वकील ने तर्क दिया कि मस्जिद एक सार्वजनिक स्थान है और इसलिए आपराधिक अतिक्रमण का कोई मामला नहीं बनता.वकील ने यह भी तर्क दिया कि ‘जय श्री राम’ का नारा लगाना आईपीसी की धारा 295 ए के तहत परिभाषित अपराध की आवश्यकता को पूरा नहीं करता है.

बार एंड बेंच ने कोर्ट के हवाले से कहा, ‘धारा 295 ए जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों से संबंधित है जिसका उद्देश्य किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उसकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना है. यह समझ में आता है कि अगर कोई ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाता है तो इससे किसी वर्ग की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचेगी. जब शिकायतकर्ता खुद कहता है कि इलाके में हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के साथ रह रहे हैं तो इस घटना का किसी भी तरह से कोई मतलब नहीं निकाला जा सकता है.’

हालांकि, अदालत ने माना कि उक्त अपराध का सार्वजनिक व्यवस्था पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा. अदालत ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट का मानना ​​है कि कोई भी कार्य आईपीसी की धारा 295 ए के तहत अपराध नहीं बनेगा. जिन कार्यों से शांति स्थापित करने या सार्वजनिक व्यवस्था को नष्ट करने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, उन्हें आईपीसी की धारा 295 ए के तहत अपराध नहीं माना जाएगा. इन कथित अपराधों में से किसी भी अपराध के कोई तत्व न पाए जाने पर, इन याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आगे की कार्यवाही की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इसके परिणामस्वरूप न्याय की विफलता होगी.’

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