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अफगानिस्तान से युद्ध ही विकल्प, तालिबान पर एक साथ आ सकते हैं पाकिस्तान और अमेरिका, पाक व‍िश्‍लेषक का बड़ा दावा

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इस्लामाबाद

पाकिस्तान बीते कुछ महीनों में अफगानिस्तान सीमा पर कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। पाकिस्तान अपने इतिहास में कई युद्ध लड़ चुका है और अब उसके तालिबान से नई लड़ाई में उलझने का डर सता रहा है। इस लड़ाई में पाकिस्तान के पड़ोसी देशों के साथ-साथ अमेरिका का रोल अहम रह सकता है। पाकिस्तान के पत्रकार और विश्लेषक सुहेल वराइच ने द न्यूज में लिखे अपने लेख में अफगानिस्तान से तनातनी, भारत और दूसरे पड़ोसी देशों के साथ संबंध और अमेरिका के साथ समीकरणों पर बात की है। उनका कहना है कि पाकिस्तान एक नए अफगान युद्ध की ओर बढ़ रहा है और इसके गंभीर भौगोलिक और राजनीतिक परिणाम होंगे।

सुहेल कहते हैं, ‘पाकिस्तान का इतिहास युद्धों और संघर्षों से भरा रहा है। आजादी के बाद से पाकिस्तान छह युद्ध लड़ चुका है और कई सीक्रेट युद्धों में भी शामिल रहा है। पाकिस्तान की सीमाएं भारत, अफगानिस्तान, ईरान और चीन से लगती हैं। चीन को छोड़कर, पाकिस्तान के सभी पड़ोसी देशों के साथ कुछ ना कुछ समस्याएं हैं। अफगानिस्तान और ईरान के साथ विवाद रहे हैं, जबकि भारत के साथ चार युद्ध पाकिस्तान लड़ चुका है।’

‘पाकिस्तान के लिए जरूरी रहे हैं युद्ध’
सुहेल का तर्क है कि भारत के साथ युद्ध पाकिस्तान की संप्रभुता की रक्षा के लिए जरूरी थे। अगर पाकिस्तान नहीं लड़ता तो उसे नेपाल और भूटान की तरह भारत के अधीन होना पड़ता। इन युद्धों ने साबित किया कि पाकिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र है और भारत जैसे बड़े देश के सामने झुकने वाला नहीं है। हालांकि भारत के साथ गठबंधन से पाकिस्तान को शांति और आर्थिक विकास मिल सकता था लेकिन इसकी कीमत कश्मीर मुद्दे पर अपने रुख को छोड़कर चुकानी पड़ती।

अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान के रिश्ते भी हमेशा से तनावपूर्ण रहे हैं। भौगोलिक कारणों से दोनों देशों के बीच कई समस्याएं हैं। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने के लिए कई प्रयास किए लेकिन वे असफल रहे हैं। अफगानिस्तान से आतंकवाद पाकिस्तान के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। सुहेल का मानना है कि पाकिस्तान के पास अब युद्ध के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

भारत की वजह से दिक्कत!
पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के रास्ते मध्य एशिया तक व्यापार मार्ग खोलने की कोशिश की है। सुहेल का मानना है कि अफगान और भारतीय सरकारों के कारण ये प्रयास विफल रहे हैं। वाखान कॉरिडोर के माध्यम से ताजिकिस्तान के साथ एक नए व्यापार मार्ग की संभावना तलाशी जा रही है, लेकिन इससे आतंकवाद की समस्या का समाधान नहीं होगा।

अमेरिका के साथ पाकिस्तान के संबंध भी उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं लेकिन ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने से अफगानिस्तान के मुद्दे पर पाकिस्तान और अमेरिका एक बार फिर एक ही पक्ष में आ गए हैं। ट्रंप ने बाइडेन प्रशासन पर अफगानिस्तान से जल्दबाजी में वापसी और हथियार छोड़ने का आरोप लगाया है। पाकिस्तान का भी यही दावा है। इस स्थिति में पाकिस्तान और अमेरिका को मिलकर इन हथियारों को वापस लेने की आवश्यकता है।

अफगानिस्तान में फिर से युद्ध
लेखक का मानना है कि एक नए अफगान युद्ध की संभावना है जिसमें पाकिस्तान फिर से अग्रणी भूमिका निभाएगा। पिछले युद्धों की तरह इस बार भी ड्रोन तकनीक महत्वपूर्ण होगी। पाकिस्तान के पास ड्रोन हैं लेकिन सटीक निशाना लगाने के लिए उसे अमेरिका के आधुनिक ड्रोन और नाइट विजन तकनीक की आवश्यकता होगी। अफगानिस्तान में अपने हितों के लिए अमेरिका अपने हितों के लिए पाकिस्तान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों आंखें मूंद सकता है।

पाकिस्तान को इस युद्ध में ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि अफगानिस्तान में उसकी जमीनी उपस्थिति कम से कम रहे। उत्तरी गठबंधन का समर्थन हासिल करना भी अच्छा कदम होगा। मध्य एशियाई देश भी इस लड़ाई में पाक की मदद कर सकते हैं। अफगानिस्तान में पाकिस्तान को कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले अहम पड़ोसी चीन को अपने साथ लाने के लिए कूटनीतिक प्रयास करने चाहिए।

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