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एमपी में कांग्रेस के लिए क्यों जरूरी है बसपा के साथ गठबंधन!

भोपाल

मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस ने बसपा से गठबंधन का ऐलान कर दिया है. इतना ही नहीं प्रदेश में दोनों ने सीटों का बंटवारा भी कर लिया है. दरअसल, मध्य प्रदेश के चुनावों में भले ही विकास की कितनी भी बात हो, लेकिन कास्ट फैक्टर हमेशा मायने रखता है. जातिगत समीकरण साधना दोनों पार्टियों के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना चुनाव लड़ना.प्रदेश की 35 विधानसभा सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, लेकिन इन सीटों के अलावा 100 से ज़्यादा सीटें ऐसी हैं जहां दलित वोट मायने रखता है, इनमें से 59 सीटों पर बीएसपी का एक बड़ा वोटबैंक है.

प्रदेश में जातिगत आधार पर वोटबैंक पार्टियों की प्राथमिकता रही है. 35 एससी और 47 एसटी विधानसभा सीटें मिलाकर 82 सीटों पर BJP और कांग्रेस दोनों की नज़र रहती है. दोनों वोटबैंक को अपनी ओर करने के लिए पार्टियां सारे पैंतरे अपनाती दिखती हैं, लेकिन इन सीटों के अलावा कई सीटें ऐसी हैं जहां सीट आरक्षित भले ही न हो लेकिन वर्ग विशेष वोटर्स का प्रतिशत गणित बिगाड़ने और बनाने का काम करता है.इनमें से ज़्यादातर सीटों पर बीएसपी दूसरी या तीसरे नंबर की पार्टी है. यही वजह है कि कांग्रेस और बीएसपी के संभावित गठबंधन से बीजेपी भी थोड़ी परेशान सी है.

आंकड़ों में क्या है बसपा का गणित
1- प्रदेश में एससी वर्ग की 35 सीटें आरक्षित हैं. जिसमें से वर्तमान में 2 कांग्रेस, 3 बीएसपी और 30 बीजेपी के पास हैं.
2- इसके अलावा 59 सीटें और ऐसी हैं जहां पर अनुसूचित जाति वर्ग का वोट 25 से 30% तक है
3- इन 59 सीटों में 41 सीटें बीजेपी, 17 सीटें कांग्रेस और 1 सीट बीएसपी के पास है.
4- खास बात ये है कि इन 59 सीटों में 12 सीटों पर बीएसपी दूसरे नंबर की पार्टी रही है.
5- बीएसपी का दबदबा रखने वाली इन 59 सीटों में से 12 सीटों पर पहली और दूसरे नंबर की पार्टी से हार का मार्जिन 2.5 हज़ार से कम है.
6- 4 सीटों पर अंतर 2.5 हज़ार से 5 हज़ार के बीच है, जबकि 5 से 10 हज़ार के अंतर वाली 16 सीटें हैं.
7- यानि कि 10 हज़ार से कम अंतर वाली 59 में से 32 सीटें हैं.
8- 35 आरक्षित सीटों में 8 सीटों पर पहली और दूसरी सीट के बीच का अंतर 5 हज़ार से कम रहा है, वहीं 5 सीटें 5 से 10 हजार के अंतर वाली हैं।
9- यानि 94 सीटों में 45 सीटों पर हार का अंतर 10 हज़ार से कम रहा है जहां बीएसपी दूसरे और तीसरे नंबर की पार्टी रही है और उसे 10 हज़ार से ज्यादा वोट मिले हैं.
10- अनुसूचित जाति आरक्षित 35 सीटें भले ही हों लेकिन 100 से ज़्यादा सीटें हैं जहां दलित वोटबैंक खासा दबदबा रखता है.
11- जानकारों की मानें तो प्रदेश में 16 फीसदी दलित वोटबैंक है जिसमें बीएसपी का कमिटेड वोटर सिर्फ 6% है.

किसका फायदा किसका नुकसान
1- दलित वोटबैंक जो पार्टियों में बंटा हुआ है, एक को वोट करेगा, इससे अनुसूचित जाति के चक्कर में सवर्ण वोटबैंक खिसक सकता है
2- बसपा की शर्तों पर सीट का बंटवारा निर्भर करता है, सीटों का बंटवारा हुआ तो मतदाता कंफ्यूज़ होंगे.
3- सरकार के खिलाफ दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता एकजुट होंगे, प्रचार के वक्त दूसरी पार्टी के लिए वोट मांगने में कार्यकर्ता हिचकिचाएंगे

इस गठबंधन के मामले पर कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता सुरेंद्र चौधरी का कहना है कि बसपा से गठबंधन होना या न होना हाईकमान का फैसला होगा, लेकिन 100 से ज़्यादा सीटें ऐसी हैं जिनपर कांग्रेस फोकस कर रही है.

वहीं BJP का कहना है कि बसपा से गठबंधन अगर कांग्रेस करती है तो उसके लिए ये नुकसान दायक होगा. उसका कहना है कि चुनाव आते आते कांग्रेस को दलित वोटबैंक के तौर पर दिखने लगता है. बाकी समय सभी वर्गों से कांग्रेस कटी रहती है.

खैर मध्य प्रदेश ही नहीं बल्कि 3 राज्यों में होने वाले चुनावों में राजस्थान औऱ एमपी में बीएसपी का खासा दखल है. हालांकि छत्तीसगढ़ में बीएसपी का दखल नहीं के बराबर है. अब मध्य प्रदेश चुनावों में देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस को फायदा होगा या नुकसान.

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