Wednesday , October 28 2020

गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र: चार दशक से हार रही कांग्रेस में मचा टिकट के लिए घमासान

 हर प्रत्याशी कर रहा जीत का दावा, टिकट के लिए दोस्त भी बने दुश्मन

भोपाल

दोस्त-दोस्त न रहा, प्यार-प्यार न रहा, जिंदगी हमें तेरा, ऐतबार न रहा यह कहावत आज गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र में सुनी जा सकती है। कांग्रेस से उम्मीदवारी जता रहे पार्टी के ही लोग आपस में टिकट को लेकर एक दूसरे का ऐतबार नहीं कर रहे। कभी चौबीसों घंटे एक साथ बैठकर दोस्ती निभाने वाले भी आज एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं। टिकट को लेकर भोपाल से लेकर दिल्ली तक घमासान मचा हुआ है। कोई गणपति बप्पा पर भरोसा जताए हुए है, श्री कृष्ण जन्माष्टमी मटकी फोड़ के आयोजनों पर।

चुनाव तक लगातार धार्मिक आयोजनों की भरमार हैं ऐसे में टिकट के दावेदार में इन कार्यक्रमों में भाग लेने की होड़ सी लगी हुई है। भीतर ही भीतर पार्टी से टिकट पाने के लिए तांत्रिकों का भी सहारा लिया जा रहा है। किसको मिलेगा टिकट यह तो हाई कमान ही तय करेगा। जिस विधानसभा क्षेत्र से लगातार भाजपा अपना परचम लहरा रही है, उसे कौन हरा पाएगा यह न तो कांग्रेस के दिग्गज जानते हैं और न ही स्थानीय नेता, लेकिन टिकट हर हाल में पाने के लिए अपने आकाओं के सामने अपनी सफाई में अपनी तारीफों के पुल या तो बॉयोडाटा से या फिर खुद अपने मुंह से बयां कर रहे हैं।

इस क्षेत्र से एक कांग्रेस नेता पक्ष खाम्बरा की भले ही क्षेत्र में मतदाताओं पर पकड़ न हो लेकिन ऐन चुनाव के वक्त वह भोपाल से लेकर दिल्ली तक एक किये हुए हैं। यही नहीं भले ही सालों से उन्होंने कांग्रेस के लिए कोई धरना प्रदर्शन न किया हो लेकिन आजकल कांग्रेस की रैली निकालकर अपना शक्ति प्रदर्शन कर संगठन को दिखा रहे हैं। रही बात अन्य उम्मीदवारों की तो वह भी किसी से पीछे दिखाई नहीं देते।

क्षेत्र के कांग्रेस नेता गिरीश शर्मा, गोविन्द गोयल, आरडी त्रिपाठी, राजेन्द्र सिंह यादव, जेपी धनोपिया, रामबाबू शर्मा, किशन सिंह राजपूत,मनीष यादव, प्रकाश चौकसे, पुरुषोत्तम सिंह, महेश मालवीय और हमीदुल्ला खान भी टिकट के लिए पूरी जान लगा रहे हैं। उन्हें भी पूरा भरोसा है कि दिल्ली दरबार एक बार टिकिट का मौका जरूर देगा। इनमें से कुछ समाजसेवी बता रहे हैं तो कुछ जन सेवक। अब इनकी बातों में कितना दम है, टिकट तो किसी एक को ही मिलना है, फिर क्या सब एकजुट होकर कांग्रेस को जिता पाएंगे इस पर आज भी सवालिया निशान लगा हुआ है।

गोविन्दपुरा विधान सभा क्षेत्र क्यों हारती है कांग्रेस
कांग्रेस से वर्ष 1967 में केएन प्रधान और 1972 में मोहनलाल आष्ठाना गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते। श्री आष्ठाना के निधन के बाद वर्ष 1974 के उपचुनाव में बाबूलाल गौर के जीतने के बाद यह सिलसिला आज तक जारी है। अब यह पूरी तरह भाजपा के गढ़ के रूप में तब्दील हो गया है। ऐसा लगता है कि अब यहां से कांग्रेस के जीत का सिलसिला कभी शुरु ही नहीं हो सकता।

आखिर इस विधानसभा क्षेत्र से क्यों हारती है कांग्रेस इस पर एक नजर डाली जाए तो साफ पता चल जाएगा कि हारे हुए कांग्रेस प्रत्याशी ने कभी भी वापस इस क्षेत्र में लौटकर आने का प्रयास ही नहीं। यहां तक की उनके दु:ख-सुख के साथी भी नहीं बन सके। उस पर आपस में गुटबाजी जारी रही। कांग्रेस के कुछ नेता तो आज भी क्षेत्रीय विधायक के सामने अपने स्वार्थ के खातिर नतमस्तक दिखाई देते हैं। इससे भाजपा मजबूत होती गई और कांग्रेस के हार का अंतर लगातार बढ़ता चला गया। वर्ष 1998 में कांग्रेस ने करनैल सिंह को उम्मीदवार बनाया। उनके हार का अंतर 10 हजार वोट था।

2003 में शिवकुमार उरमलिया हार का अंतर 60 हजार वोट ,2008 में विभा पटेल हार का अंतर करीब 30 हजार वोट और वर्ष 2013 में कांग्रेस नेता गोविन्द गोयल 70 हजार वोट। यह सब वर्तमान विधायक व नगरीय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर से हारे। कांग्रेस का इसे दुर्भाग्य कह सकते हैं कि यह नेता हारने के बाद इस विधानसभा क्षेत्र में दोबारा लौटकर जनता के दुख-दर्द में शामिल नहीं हुए। इससे न केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा बल्कि मतदाता भी रूठे। भाजपा मजबूत होती चली गई और कांग्रेस कमजोर। आज भी जो कांग्रेसी टिकिट के सशक्त दावेदार हैं वह भी आत्म मंथन करें कि वह जनता के कितने करीब हैं।

Did you like this? Share it:

About editor

Check Also

सिंधिया ने किया MP में स्वागत, रैली में बोले पायलट- बीजेपी सरकार को उखाड़ फेंको

ग्वालियर, मध्य प्रदेश का उपचुनाव यूं तो विवादित बयानों का केंद्र बन गया है. मगर, …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)
Do NOT follow this link or you will be banned from the site!