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22 विधायकों की अयोग्यता पर कब होगा फैसला, SC ने स्पीकर से एक सप्ताह में मांगा जवाब

भोपाल/नई दिल्ली।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मध्य प्रदेश विधानसभा के स्पीकर से पूछा कि 22 विधायकों की अयोग्यता के मामले में वे कब तक फैसला लेंगे। अदालत ने स्पीकर से एक सप्ताह में जवाब मांगा है। चीफ जस्टिस एस ए बोवडे, जस्टिस ए एस बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्पमण्यम की बेंच ने कहा कि स्पीकर को केवल एक बयान ही देना है, इसलिए इससे ज्यादा समय की जरूरत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस विधायक विनय सक्सेना की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश स्पीकर को दिया। सक्सेना के वकील विवेक तन्खा ने अदालत से कहा कि कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए 22 विधायकों की अयोग्यता का मामला स्पीकर के पास 12 मार्च से लंबित है। इस पर जल्दी फैसला नहीं हुआ तो इनमें से मंत्री बने विधायक अपने पद पर बने रह सकते हैं।

मामले में विधानसभा सचिवालय का पक्ष रखने वाले वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उन्हें एक दिन पहले यानी सोमवार शाम को ही याचिका की प्रति मिली है। इसका जवाब देने के लिए उन्हें कम से कम 3 सप्ताह का समय मिलना चाहिए। इसी का जवाब देते हुए कोर्ट ने कहा कि स्पीकर को केवल एक बयान ही देना है कि इस पर वे कब तक फैसला ले लेंगे। उसके बाद विधानसभा सचिवालय के वकील ने दो सप्ताह का समय मांगते हुए कहा कि वे स्पीकर के वकील नहीं हैं। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह कहते हुए उनकी मांग खारिज कर दी कि विधानसभा और स्पीकर में कोई फर्क नहीं है।

इसके बाद अदालत ने जवाब देने के लिए अगले सप्ताह तक का वक्त दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 17 अगस्त को स्पीकर से सक्सेना की याचिका पर जवाब मांगा था। सक्सेना ने अपनी याचिका में दावा किया है कि अयोग्यता के मामले में फैसला होने से पहले इन विधायकों को मंत्री नहीं बनाया जा सकता।

याचिका में यह भी कहा गया है कि मणिपुर केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक विधायकों की अयोग्यता के मामलों में स्पीकर को 3 महीने के अंदर फैसला ले लेना चाहिए। कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए 22 में से 12 विधायक शिवराज सिंह चौहान की सरकार में मंत्री हैं। याचिका में कहा गया है कि 12 मार्च से मामला लंबित रहने के बावजूद स्पीकर ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है। इस मामले में और देरी हुई तो दलबदल कानून का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

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