Thursday , September 24 2020

तेल के बदले रुपया: क्या भारत का प्रस्ताव स्वीकार करेगा सऊदी अरब?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को इंडिया एनर्जी फोरम में दुनिया और भारत की बड़ी तेल और गैस कंपनियों के सीईओज को संबोधित  किया। उन्होंने सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात समेत तमाम तेल निर्यातक देशों से कहा कि वे कच्चे तेल का पेमेंट डॉलर की जगह रुपये में लें, ताकि भारत की मुद्रा पर जारी दबाव कम हो। साथ ही, उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि कच्चे तेल के ऊंचे दाम से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है। इस बैठक में सऊदी अरब के पेट्रोलियम मंत्री खालिद ए अल-फलिह और संयुक्त अरब अमीरात के मंत्री के अलावा प्रमुख तेल कंपनियों के मुख्य कार्याधिकारी और विशेषज्ञ भी बैठक में शामिल थे। अब सवाल यह उठता है कि क्या सऊदी अरब जैसे देश भारत के प्रस्ताव को स्वीकार करेंगे?

ईरान का मॉडल
दरअसल, भारत ने अपने तीसरे सबसे बड़े तेल निर्यातक देश ईरान को अतीत में अमेरिकी पाबंदियां लगने के बाद रुपये में ही भुगतान किया था। बदले में ईरान ने उसी रुपये का इस्तेमाल भारत से दवाइयां और अनाज खरीदने में किया करता। इस तरह दोनों देशों ने डॉलर में पेमेंट की मजबूरी से मुक्ति पाई थी। इतना ही नहीं, वह भारत को 60 दिनों की उधारी पर कच्चा तेल देने लगा, जबकि अन्य तेल निर्यातक देश ऐसा नहीं करते हैं। साथ ही, ईरान ही तेल की ढुलाई और इंश्योरेंस का खर्च भी खुद वहन करता है। अभी भारत यूरोपियन बैंकिंग चैनलों के जरिए ईरान को यूरो में पेमेंट कर रहा है।

ऑइल मार्केट को खतरा
भारत न केवल दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, बल्कि यह बहुत बड़ा बाजार भी है। ऐसे में भारत को विकल्पों पर विचार करने को मजबूर किए जाने से ऑइल मार्केट में तहलका मच सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी तेल पर महाबैठक में कहा था कि अंडे लो, मुर्गियां मत मारो। उधर, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने भी बैठक में कहा था, ‘कच्चे तेल के बढ़ते दाम से भारत के समक्ष बड़ी चुनौती खड़ी हो रही है। पिछले एक साल में कच्चे तेल के दाम डॉलर के लिहाज से 50 प्रतिशत और रुपये के लिहाज से 70 प्रतिशत बढ़ चुके हैं।’

इस बार काम आएगा पुराना नुस्खा?
भारत ने पहले भी तेल निर्यातकों को रुपये में पेमेंट लेने को राजी करने का प्रयास किया था, लेकिन सफलता नहीं मिली। वर्ष 2013 में जब डॉलर के मुकाबले रुपया 20% कमजोर हो गया था, तब भारत ने अपने बड़े व्यापारिक भागीदारों के साथ अपने कुछ तेल निर्यातकों पर रुपये में पेमेंट लेने का दबाव बनाया था। भारत ने यूरोपीय आयातकों के मुकाबले एशियाई देशों से तेल की ज्यादा कीमत वसूले जाने पर भी तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक का विरोध किया था, लेकिन उसका भी कोई सकारात्मक परिणाम नहीं आया। ओपेक के सदस्य देश एशियाई देशों से तेल पर एशियन प्रीमियम वसूलते हैं। इसी साल भारत ने तेल आयातक देशों के सामने तेल के लिए बेहतर डील के लिए संगठित होने का प्रस्ताव रखा, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी। साल 2005 में भारत भी भारत ने तेल पर दो बार मंत्रीस्तरीय राउंडटेबल कॉन्फ्रेंस किए थे, जिसका कोई परिणाम सामने नहीं आया था। तो सवाल फिर वही है, क्या इस बार भारत का प्रस्ताव मानेंगे तेल निर्यातक देश?

80% तेल आयात करता है भारत
भारत कच्चे तेल का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ग्राहक है। ईरान पर 4 नवंबर से लागू होनेवाले अमेरिकी प्रतिबंधों के मद्देनजर भारत तेल आयात के लिए सऊदी अरब की तरफ देख रहा है। गौरतलब है कि भारत तेल की कुल जरूरतों का 80% हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इराक और सऊदी अरब के बाद ईरान उसका तीसरा सबसे बड़ा तेल निर्यातक है।

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