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अरुण जेटली बोले, UPA की नीतियों से टूटी बैंकों की कमर

नई दिल्ली

केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने कांग्रेस की यूपीए सरकार के समय दहाई में विकास दर हासिल करने वाली बात का जवाब दिया है। उन्होंने अपनी एक फेसबुक पोस्ट में लिखा, ‘यूपीए की नीतियों की वजह से मैक्रो-इकनॉमी में अस्थिरता आई। यूपीए के शासनकाल में राजकोषीय अनुशासन के साथ समझौता किया गया बैंकों को बिना रोक-टोक कर्ज देने के निर्देश दिए गए जिसकी वजह से बैंकिंग व्यवस्था खतरे में पड़ गई। 2014 में जब यूपीए के हाथ से सत्ता गई, उससे पहले के तीन सालों में भी विकास का रेकॉर्ड मामूली से भी कम था।’

बता दें कि नैशनल स्टेटिस्टिकल कमिशन (NSC)की सब कमिटी द्वारा जारी की गई 2011-12 की जीडीपी वृद्धि की शृंखला को लेकर एक बहस चल रही है। पुरानी शृंखला 2004-05 के तहत सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर स्थिर मूल्य पर 2006-07 में 9.57 प्रतिशत रही। उस समय मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। नई शृंखला (2011-12) के तहत यह वृद्धि दर संशोधित होकर 10.08 प्रतिशत रहने की बात कही गई है। वर्ष 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की अगुवाई में शुरू आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत के बाद यह देश की सर्वाधिक वृद्धि दर है। इस पर जेटली ने कहा कि यूपीए की नीतियों की वजह से बाद में बहुत मामूली विकास दर रही। जेटली ने अपनी पोस्ट में तर्क को साबित करने के लिए 1999 से 2018 तक के राज कोषीय घाटे, बैंक क्रेडिट ग्रोथ, मंदी और चालू खाता घाटे के आंकड़े भी पेश किए।

उन्होंने कहा कि 2003-04 का समय वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा था। उस समय ज्यादातर अर्थव्यवस्थाओं का प्रदर्शन अच्छा था और विकास दर बहुत ऊंची थी। जेटली ने कहा, ‘यह समय 2008 तक चला और इसके बाद वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था की हालत खराब होने लगी। 2003 से 2008 तक भारत की विकास दर में वृद्धि भी एक सामान्य बात थी। 2004 में बाजपेयी सरकार 8 प्रतिशत से ज्यादा की विकास दर छोड़कर गई थी। इसके अलावा 1991 से हुए सुधारों का भी फायदा 2004 में आई यूपीए सरकार को मिला।’

अरुण जेटली ने कहा कि वैश्विक स्थिति ने भारत की विकास दर बढ़ने में मदद की। उस दौरान मांग ज्यादा थी, निर्यात बढ़ रहा था और इसलिए उभरती हुई अर्थव्यवस्था के लिए यह अच्छा समय था। उस दौरान किसी भी तरह का घरेलू सुधार नहीं किया गया। उन्होंने कहा, ‘जब यह हनीमून पीरियड खत्म हो गया तो विकास दर गिरने लगी। इसे सुधारने के लिए दो कदम उठाए गए। पहला राजकोषीय अनुशासन को तोड़ा गया और दूसरा बैंकों को बिना रोकटोक कर्ज देने को कहा गया जिससे बैंकिंग सिस्टम खतरे में पड़ गया। 2014 से पहले भी तीन साल की विकास दर मामूली से भी कम थी।’

उन्होंने कहा कि NDA सरकार में करंट अकाउंट बैलेंस पॉजिटिव है जो कि यूपीए 1 में नीचे चला गया था यूपीए-2 में सबसे ज्यादा हो गया था। बैंक क्रेडिट ग्रोथ के आंकड़ों का हवाला देते हुए जेटली ने कहा कि यूपीए-1 और यूपीए-2 के दौरान बड़ी मात्रा में कर्ज दिया गया। उन्होंने कहा, ‘बिना जांच पड़ताल के लापरवाही के साथ कई परियोजनाओं को कर्ज दिया गया। बैंकों पर बोझ बढ़ गया और NPA से बैंक परेशान होने लगे। 2012-13 में बैंक कमजोर हो गए और उनकी उधार देने की क्षमता कम हो गई। 2014 के बाद बैंकों की यह सचाई सामने आई और सुधार के कदम उठाए गए।’

जेटली ने कहा कि लापरवाही के साथ खर्च करना किसी अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। ऐसा करने पर भविष्य की पीढ़ी कर्ज में डूब सकती है। उन्होंने कहा, ‘2008 के बाद यूपीएस सरकार ने रेवेन्यू से ज्यादा खर्च करना शुरू कर दिया।2011-12 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 5.9 फीसदी हो गया। तब से जाकर 2017-18 में यह 3.5 प्रतिशत हो पाया है।’ उन्होंने कहा कि पिछले 4 साल से भारत सबसे तेजी से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था है और विकास दस के मामले में चीन को भी पीछे छोड़ रही है।

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