Saturday , September 26 2020

आज RBI बोर्ड की बैठकः पटेल झुकेंगे या इस्तीफा देंगे?

नई दिल्ली

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बोर्ड की बहुप्रतीक्षित बैठक आज होने वाली है। पिछले कई दिनों से विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच टकराव जारी है। सरकार अर्थव्यवस्था के पिछड़ने का हवाला देकर अपनी मांगें मनवाना चाहती है, तो आरबीआई का कहना है कि अगर वह सरकार की मांगों को मान लेता है, तो इससे बैंकिंग प्रणाली ध्वस्त हो जाएगी।

कहा जा रहा है कि सरकार केंद्रीय बैंक के बोर्ड में अपने नामित सदस्यों के जरिये आरबीआई पर अपनी मांगों पर प्रस्ताव जारी करने का दबाव बना सकती है। लेकिन आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल के रुख को देखकर ऐसा लगता नहीं है। ऐसे में सरकार आरबीआई ऐक्ट के सेक्शन 7 का इस्तेमाल करते हुए आरबीआई को अपनी बात मनवाने के लिए मजबूर कर सकती है। ऐसी स्थिति में पटेल के पास दो ही विकल्प होंगे, या तो वह सरकार की मांगों पर सहमति जता दें या फिर इस्तीफा दे दें।

केंद्रीय बैंक के डेप्युटी गवर्नर विरल आचार्य ने पिछले दिनों साफ शब्दों में सरकार को चेता दिया था कि अगर उसने संस्थान की स्वायत्तता को ठेस पहुंचाई, तो बाजार को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। आइए जानते हैं, वे 10 मुद्दे, जिनपर दोनों के बीच तलवारें खिंची हैं।

1. मुख्य ब्याज दर
केंद्रीय बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के कार्यकाल की शुरुआत केंद्र सरकार के साथ बेहद सौहार्दपूर्ण माहौल में शुरू हुई थी। आरबीआई ने केंद्र के नोटबंदी के फैसले का समर्थन भी किया था। लेकिन बाद में मुख्य ब्याज दर के मुद्दे पर दोनों के संबंधों में तब कड़वाहट आनी शुरू हो गई, जब पटेल के नेतृत्व वाली मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने दरों पर फैसला लेने से पहले मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन से मुलाकात करने से मना कर दिया।

2. लाभांश का भुगतान
केंद्र सरकार आरबीआई द्वारा महज 30 हजार करोड़ रुपये के लाभांश के भुगतान से हैरान रह गई, जबकि बजट 66 हजार करोड़ रुपये का था। इसके कारण केंद्रीय वित्त मंत्री को केंद्रीय बैंक से और भुगतान की मांग करनी पड़ी, लेकिन उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

3. लोन रिस्ट्रक्चरिंग मुद्दा
आरबीआई ने तमाम लोन रिस्ट्रक्चरिंग स्कीम्स को बंद कर दिया और बैंकों से सभी संभावित नुकसान के लिए फंड (प्रोविजनिंग) अलग करने को कहा, चाहे डिफॉल्ट एक दिन का ही क्यों न हो। सरकार तथा बैंकों ने आरबीआई के इस कदम का यह कहकर विरोध किया कि यह कदम व्यवहार्य नहीं है।

4. सरकारी बैंकों का रेग्युलेशन
नीरव मोदी द्वारा किए गए पीएनबी घोटाले को पकड़ने में नाकाम रहने के लिए सरकार ने आरबीआई की कड़ी आलोचना की। इसपर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए गवर्नर ने आरोप लगाया कि सरकारी बैंकों के रेग्युलेशन के लिए सरकार उसे शक्तियां नहीं दे रही। केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने यह कहते हुए पलटवार किया कि आरबीआई के पास इसके लिए पर्याप्त शक्तियां थीं और सरकारी बैंकों के सीईओ की नियुक्ति पर उससे परामर्श लिया गया था।

5. प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन
आरबीआई ने आधे सरकारी बैंकों को प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) के दायरे में रखा है, जिसके कारण उनपर कर्ज देने को लेकर कई तरह की पाबंदियां लगी हुई हैं। पीसीए के तहत अगर बैंकों को कर्ज देना है, तो सरकार को पहले उन्हें रिकैपिटलाइज करना पड़ेगा। सरकार व्यवस्था में नकदी की किल्लत के मद्देनजर, आरबीआई पर इन पाबंदियों को हटाने का दबाव बना रही है। आरबीआई ने साफ शब्दों में कहा है कि पीसीए के कारण ही बैंकों का बैड लोन (फंसा कर्ज) बढ़ने से बचा है।

6. पेमेंट्स रेग्युलेटर
पेंमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 में संशोधन करने के लिए गठित अंतर-मंत्रालयी समिति ने एक पेमेंट रेग्युटर के गठन का सुझाव दिया है, जो पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम पर केंद्रीय बैंक की शक्तियों को बाइपास करेगा। इसपर नाराजगी जताते हुए आरबीआई ने कहा था कि पेमेंट सिस्टम बैंक डोमिनेटेड है और केंद्रीय बैंक द्वारा इसका रेग्युलेशन डॉमिनैंट इंटरनेशनल मॉडल है।

7. आरबीआई बोर्ड में नियुक्तियां
नचिकेत मोर को उनका कार्यकाल खत्म होने से पहले ही बिना सूचना दिए बोर्ड से हटा दिया गया। आरबीआई के सीओओ के लिए दिग्गज बैंकर नचिकेत मोर पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की पहली पसंद थे।नचिकेत मोर सरकार द्वारा मांगे गए अधिक लाभांश का खुलकर विरोध कर रहे थे। सरकार पर बोर्ड में अपने पसंदीदा लोगों को भरने का आरोप लगाया गया है, इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े एस. गुरुमूर्ति और सतीश मराठे भी शामिल हैं।

8. तेल कंपनियों के लिए विशेष डॉलर विंडो
तेल कंपनियों की फॉरेक्स जरूरतों को पूरा करने के लिए आरबीआई द्वारा विशेष डॉलर विंडो खोलने के लिए मना करने पर केंद्र सरकार को कंपनियों को विदेश से कर्ज लेने की मंजूरी देने को मजबूर होना पड़ा।

9. एनबीएफसी में नकदी किल्लत
आईएलएंडएफएस डिफॉल्ट की वजह से गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) सेक्टर में नकदी का भारी संकट पैदा हो गया। इसका असर बाजार पर पड़ने का खतरा पैदा हो गया, क्योंकि म्यूचुअल फंडों द्वारा करीब 40 फीसदी डेट इन्वेस्टमेंट एनबीएफसी कंपनियों में किया गया है। साल 2008 में पैदा हुए कुछ इसी तरह के संकट के दौरान आरबीआयह भी पढ़ेंः उर्जित पटेल भी बने केंद्र के गले की फांस! जानिए पूरा माजराई ने एक स्पेशल पर्पज वीइकल के सहारे एनबीएफसी की संपत्तियों को खरीदने की मंजूरी प्रदान की थी। सरकार फिर यही सुविधा दोबारा चाह रही थी, जिसका आरबीआई ने विरोध किया। परिणामस्वरूप, एनबीएफसी की संपत्तियां खरीदने के लिए सरकार को सरकारी बैंकों का रुख करना पड़ा।

10. आरबीआई के पास कैश रिजर्व
सरकार की नजर आरबीआई के पास मौजूद अतिरिक्त रिजर्व पर है। सरकार तर्क दे रही है कि अधिकांश दूसरे केंद्रीय बैंक इतनी नकदी पर नहीं बैठे हैं। दरअसल, आरबीआई इस अतिरिक्त नकदी को सरकार को देने को इच्छुक नहीं है, क्योंकि वह इसे विनिमय दर को नियंत्रित करने का जरिया मानती है और उसका मानना है कि इसका इस्तेमाल केंद्र सरकार के राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए नहीं होना चाहिए।

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