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इसरो जासूसी: जिंदा नहीं देख पाए अपनी बेगुनाही

बेंगलुरु

इसरो जासूसी मामले में पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायणन के साथ ही के चंद्रशेखर का नाम भी आया था। जब सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नंबी को 50 लाख मुआवजे का ऐलान किया चंद्रशेखर तब तक कोमा में जा चुके थे। नंबी, चंद्रशेखर और चार दूसरे लोगों को सुप्रीम कोर्ट ने 1998 के इस केस में निर्दोष करार दिया था। चंद्रशेखर 20 साल तक इस फैसले का इंतजार करते रहे लेकिन रविवार रात उनका निधन हो गया।

चंद्रशेखर रूसी स्पेस एजेंसी ग्लवकॉसमॉस में भारत के प्रतिनिधि थे। उनकी पत्नी ने बताया कि चंद्रशेखर को टीवी पर आ रही न्यूज दिखाने की कोशिश की गई लेकिन वह बेहोश थे और उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। उन्होंने बताया कि वह बेसब्री से इस पल का इंतजार कर रहे थे लेकिन जब यह समय आया तब तक देर हो गई थी। उनके परिवार को यह भी नहीं पता कि आखिर वक्त में खुशखबरी उन तक पहुंची भी या नहीं।

पत्नी ने बताया, ‘करियर-शांति सब तबाह’
लंबी बीमारी के बाद 76 साल के चंद्रशेखर को एक महीने पहले अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह 1992 से ग्लवकॉसमॉस से जुड़े थे। बताया जाता है कि केरल पुलिस और आईबी की प्रताड़ना झेलने के बाद चंद्रशेखर विद्यारण्यपुरा में रहने लगे थे। उनकी पत्नी विजयम्मा सवाल करती हैं कि केरल पुलिस और आईबी को चंद्रशेखर को फंसाकर क्या मिला। वह पूछती हैं कि इतने साल तक जो ट्रॉमा उन्होंने झेला है उसके लिए कौन जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि चंद्रशेखर का करियर और मन की शांति उन लोगों ने तबाह कर दिया। उन्होंने बताया, ‘केरल में हमारे घर पर हमला किया गया, उन्हें गद्दार बोला गया और हमें प्रताड़ित किया गया। हम जानना चाहते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया।’ चंद्रशेखर की कोई संतान नहीं है।

‘समय साबित करेगा बेगुनाही’
उनके परिवार ने बताया कि जासूसी विवाद होने के बाद चंद्रशेखर लोगों की नजर से दूर रहने लगे थे। वह घटना से काफी टूट गए थे। वह हमेशा कहते थे कि समय उन्हें निर्दोष साबित करेगा। उनके एक रिश्तेदार ने बताया कि उन्हें भरोसा था कि चंद्रशेखर निर्दोष हैं लेकिन वह केस नहीं लड़ सके क्योंकि उनकी पत्नी केंद्रीय कर्मचारी थीं और उन्हें लगा था कि केस की वजह से उनकी नौकरी पर खतरा आ जाएगा। दोनों का घर विजयम्मा की सैलरी से ही चलता था।

सुप्रीम कोर्ट ने बताया केस झूठा
केरल पुलिस और आईबी की हिरासत के दौरान चंद्रशेखर को जांचकर्ताओं के सामने कथित तौर पर स्ट्रिप किया गया, प्रताड़ित किया गया और शारीरिक यातनाएं दी गईं। पिछले शुक्रवार सुप्रीम कोर्ट ने इसरो केस को झूठा और गैरजरूरी बताया। नारायण को 50 लाख का मुआवजा भी दिया गया। केस पहली बार तब सामने आया था जह 1994 में नारायाण और डी साई को भारत की स्पेस टेक्नॉलजी से जुड़े अहम दस्तावेज पाकिस्तान को सौंपने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में सीबीआई ने 1996 में केरल कोर्ट से कहा कि मामला झूठा है। इसके बाद सभी आरोपियों को रिहा कर दिया गया।

नारायण ने बाद में आरोप लगाया कि भारत के इंटेलिजेंस अधिकारी सीआईए के साथ काम कर रहे हैं और इसरो उनका पहला निशाना है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रकरण से आरोपी वैज्ञानिकों के करियर खराब हो गए। वहीं क्रायॉजीनिक इंजिन डिवेलपमेंट प्रोग्राम का काम भी रुक गया जो जीएसएलवी को चलाने वाला था।

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