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इसरो जासूसी: ‘नंबी का नाम लेने को टॉर्चर किया’

चेन्नै

24 साल पुराने जासूसी केस में आरोपी इसरो के पूर्व वैज्ञानिक एस. नंबी नारायणन को सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़ी राहत दी थी। कोर्ट ने कहा कि वैज्ञानिक नारायणन को केरल पुलिस ने बेवजह गिरफ्तार किया था और उन्हें मानसिक प्रताड़ना दी थी। शीर्ष अदालत ने इसरो वैज्ञानिक को 50 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया और एक न्यायिक समिति से गड़बड़ी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ जांच कराने का भी आदेश दिया।

मामले में मालदीव की जिस महिला मरियम रशीदा की 1994 में सबसे पहले गिरफ्तारी हुई थी और जहां से इस केस की शुरुआत हुई थी, उसने दावा किया है कि वह अब आईबी और केरल पुलिस पर केस करेगी और मुआवजे की मांग करेगी।

मरियम ने हमारे सहयोगी टाइम्स ऑफ इंडिया से फोन पर हुई बातचीत के दौरान इस केस के बारे में खुलकर बात की। मरियम ने कहा, ‘हिरासत के दौरान मुझे टॉर्चर किया गया और मजबूर किया गया कि मैं नंबी नारायणन का नाम लूं। मैंने अपनी इज्जत खोई है, मैं उन लोगों को छोड़ूंगी नहीं।’ अक्टूबर 1994 को मरियम रशीदा को तिरुवनंतपुरम से गिरफ्तार किया गया था। रशीदा को इसरो के स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन की ड्रॉइंग की खुफिया जानकारी पाकिस्तान को बेचने की आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

रशीदा और अन्य 6 आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट ने जासूसी केस से बरी कर दिया था। शुक्रवार को नंबी नारायणन पर आए फैसले पर मरियम ने कहा कि उन्हें जो मुआवजा दिया गया है वह उनके उस सम्मान के आगे बेहद कम है, जो उन्होंने खोया है।

1996 में सीबीआई ने दी क्लीन चिट, तब भी जेल में रहीं
रशीदा ने 1994 से 1998 तक करीब साढ़े तीन साल केरल की जेल में गुजारे। जब तक 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें केस से बरी नहीं कर दिया। सीबीआई ने 1996 में जो क्लोजर रिपोर्ट दी थी उसमें इस बात की सिफारिश की गई थी कि आरोपी को टॉर्चर करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। हालांकि इस क्लोजर रिपोर्ट के बाद भी ज्यादा कुछ नहीं हुआ। रशीदा जेल में ही रहीं क्योंकि केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी कि इस मामले में नए सिरे से जांच कराई जाए।

‘केरल पुलिस और आईबी ने हिरासत में मुझे टॉर्चर किया’
रशीदा ने बताया कि तत्कालीन एसआईटी चीफ सिबी मैथ्यूज़ (जो बाद में केरल के डीजीपी और सीआईसी भी बने) और स्पेशल ब्रांच के इंस्पेक्टर एस. विजयन ने मुझे फंसाने की साजिश रची थी। उन्होंने कहा कि मेरा वकील जल्द ही उचित कोर्ट में जाकर इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अपील करेगा, लेकिन मैं इंडिया वापस नहीं आऊंगी।

यह पूछने पर कि अभी तक आप क्यों चुप थीं, रशीदा ने कहा कि मैं शुरुआती दौर में गहरे सदमे में और डरी हुई थी। बाद में मुझे पता चला कि एक विंडो पीरियड होता है जिसके अंदर मुझे केस फाइल ही करना है। उन्होंने कहा, ‘मुझे लगा वह पीरियड खत्म हो चुका है। मगर सुप्रीम कोर्ट के शुक्रवार को आए फैसले के बाद मुझे पता चला कि मैं अब भी केस कर सकती हूं।’

‘प्रमोशन के लालच में इंस्पेक्टर ने फंसाया’
रशीदा अपनी दोस्त फौजिया हसन की बेटी की पढ़ाई और स्वास्थ्य संबंधी किसी काम से इंडिया आई थीं, जब उन्हें 1994 में इस केस में गिरफ्तार किया गया। उन्होंने बताया कि इंस्पेक्टर विजयन ने किस तरह उन्हें टॉर्चर किया। रशीदा ने कहा, ‘मैंने जब उससे बताया कि मैं माले वापस नहीं जा पाऊंगी क्योंकि वहां प्लेग फैल रहा है, विजयन ने मेरा पासपोर्ट रख लिया। वह करीब 18 दिन तक पासपोर्ट अपने पास रखे रहा और फिर मुझे परमिट से ज्यादा रुकने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। हिरासत में उसने मुझे बुरी तरह पीटा। उसे लगता था कि अगर वह एक जासूसी केस बनाएगा तो उसे जल्दी प्रमोशन मिल जाएगा। उसके अलावा आईबी और केरल पुलिस के और भी कई लोग थे जिन्होंने मुझे बुरी तरह पीटा, मगर मुझे उनके नाम नहीं याद हैं।’

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