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गजनी: अफगान में भारतीय प्रॉजेक्ट पर बढ़ा खतरा

नई दिल्ली

अफगानिस्तान में भारत की फंडिंग से चल रहीं परियोजनाओं और कार्यक्रमों के लिए जोखिम बढ़ गया है। अफगानिस्तान ने आरोप लगाया है कि हाल में तालिबान ने गजनी में जो हमला किया था, उसमें पाकिस्तानी सेना और वहां की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) का भी हाथ था। उसने कहा है कि पाकिस्तान ने हमले में तालिबान की मदद की थी।

जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान में भारत के प्रभाव को कम करना चाहता है। अफगानिस्तान सरकार के बड़े अधिकारियों ने इकनॉमिक टाइम्स को बताया कि गजनी हमले में ISI के शामिल होने के सबूत जल्द ही पाकिस्तान को सौंपे जाएंगे। हालांकि, पाकिस्तान के आर्मी चीफ ने इस हमले में अपने लोगों की भूमिका से इनकार किया है।

अफगानिस्तान के नैशनल डायरेक्टोरेट ऑफ सिक्योरिटी (NDS) ने ISI पर अफगानिस्तान और तालिबान के बीच संभावित युद्धविराम को तोड़ने के लिए गजनी हमले की साजिश रचने का आरोप लगाया है। पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर NDS के एक ऑफिसर ने बताया कि ISI ने आतंकी समूह लश्कर-ए-तैयबा को हमले की जिम्मेदारी सौंपी थी। इस आतंकी संगठन ने पेशावर, क्वेटा और पंजाब से हमले के लिए आतंकी भेजे थे। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान के सैन्यकर्मी तालिबान और दूसरे आतंकियों को निर्देश देने के लिए वहां मौजूद थे।

अफसर ने कहा, ‘अफगानिस्तान के पख्तिया और खोस्त प्रांतों के माध्यम से कुछ घायल हमलावरों को वजीरिस्तान और क्वेटा के अस्पतालों में भेजा गया।’ NDS के अनुसार, हमलावर चार समूहों में बंटे थे। पहले समूह का नाम जुबैर बिन अल अलम था। इसके पास पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा के 120 हमलावर थे। गुजरांवाला शहर का निवासी जुबैर (काल्पनिक नाम) ने समूह की अगुवाई की। दूसरा समूह खालिद बिन वालिद का था। इसमें लश्कर के 90 आतंकी थे। इसकी अगुवाई खालिद अहमद (काल्पनिक नाम) ने की थी। तीसरे समूह का नाम अल-मंसूर था। इसमें हक्कानी नेटवर्क, गजनी, जाबुल और दक्षिणी वजीरिस्तान के 120 सदस्य थे।

गजनी में पांच दिनों तक चली लड़ाई में सैकड़ों लोगों की मौत हुई और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे। आतंकियों ने गजनी में कई बाजार, दुकानों, नेशनल रेडियो और टीवी ट्रांसमीटर्स और प्राइवेट रेडियो स्टेशंस और मीडिया हाउसों को आग के हवाले कर दिया था। अफगानिस्तान-पाकिस्तान मामले के विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तानी सेना के अफसर और सैनिकों पर अफगानिस्तान में 1996-2001 के दौरान तालिबान शासन में संलिप्त होने का आरोप लगा था। एक बार फिर तालिबान देश में घुसा है और ऐसा लगता है कि गजनी पर उनका नियंत्रण हो गया है। माना जाता है कि अमेरिका में 11 सितंबर के हमले के बाद जब 2001 में तालिबान को काबुल से बाहर निकाला गया था, तब पाकिस्तान के 3000 सैन्य अफसर और अन्य अधिकारी अफगानिस्तान में मौजूद थे।

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