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जब विधानसभा में मुनि तरुण सागर ने कहा था- सबसे खूंखार लोग तो यहीं बैठे हैं!

भोपाल

जैन मुनि तरुण सागर महाराज अब हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन उनकी सटीक बातें,समाज और इंसानियत को जगाते प्रवचन सबकी यादों मेंं रहेंगे. महाराज का जन्म दमोह में हुआ था और उनकी यादें मध्यप्रदेश विधानसभा तक से जुड़ीं. मध्य प्रदेश विधानसभा में अपने प्रवचन में मुनि ने नेताओं के लिए कहा था, कि सबसे ज़्यादा खूंखार लोग तो यहीं बैठे हैं.

वाकया 27 जुलाई 2010 का है, जब मुनि तरुण सागर ने मध्य प्रदेश विधानसभा को संबोधित किया था. वे पहले संत थे जिन्हें विधानसभा को संबोधित करने का अवसर मिला था. अपने संबोधन के दौरान तरुण सागर ने कहा था कि सबसे खूंखार लोग यहीं बठे हैं. अगर नेता सुधर जाएं तो जग सुधर जाएगा. विधानसभा के उस संबोधन के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ईश्र्वरदास रोहाणी ने खुद मुनि तरुण सागर का स्वागत किया था.

प्रवचन के बाद खुद तरुण सागरजी बोले थे कि संतों को अब जनता के बीच प्रवचन नहीं करने चाहिए बल्कि राजनेताओं के लिए लोकसभा और विधानसभा में प्रवचन देना चाहिए. क्योंकि सबसे ज्यादा जरूरत यहीं है. विधानसभा के भीतर जब तरुण सागर का प्रवचन शुरू हुआ तो विधान सभा सदस्य उन्हें सुनते रह गए. बताया जाता है अपने संबोधन में उन्होंने नेताओं की आत्मा को झकझोर दिया था. बाद में तरुण सागर को मध्य प्रदेश सरकार ने 6 फरवरी 2002 को ‘राजकीय अतिथि’ का दर्जा दिया था.

एक और वाकया साल 30 जनवरी 1994 का है, जब भोपाल स्थित मंगलवारा रोड स्थित जैन मंदिर में उनके प्रवचन सुनकर तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह मंत्रमुग्ध हो गए थे. प्रवचन में तत्कालीन शिक्षा मंत्री मुकेश नायक भी मौजूद थे. नायक तो इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने फिर अपने घर पर भी संतजी का प्रवचन कराया. उस वाकये को याद करते हुए मुकेश नायक कहते हैं कि हमने मुनि तरुण सागर की एक शिक्षा संगोष्ठी करवाई उसमें प्रदेश के कई शिक्षाविद और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग आए थे. सारी रात लोग उनको सुनते रहे.

मुकेश नायक आगे कहते हैं, मैं उनकी पहली पुस्तक ‘मैं तुम्हें सिखाने नहीं जगाने आया हूं’ का संपादक था. उनके साथ मेरे बहुत अच्छे संबंध रहे थे. नायक बताते हैं कि मैं ऐसा नहीं कहूंगा कि उनकी मौत का मुझे दुख है क्योंकि वे कहते थे कि इंसान को दुखी नहीं होना चाहिए बल्कि सहनशील होना चाहिए, लेकिन उनके जाने से समाज को अपूर्णीय क्षति हुई है. उन्होंने कहा कि मैं उनसे सैकड़ों बार मिला हूं, उनकी अनेक सभाओं में भाग लिया, उनके जैसे प्रखर वक्ता बहुत कम देखने को मिले हैं.

जैन मुनि तरुण सागर नेताओं को प्रवचन देने के पक्षधर थे. तरुण सागर मानना था कि संत पर पूरे समाज का दायित्व होता है. और वह समाज का गुरु होता है. समाज में गलत को गलत बोलना कोई गुनाह नहीं है. मुनि तरुण सागर ‘कड़वे प्रवचन’ नाम से समाज और राष्ट्र के अहम मुद्दों पर तीखी शब्दों में अपनी राय देते थे. ‘कड़वे प्रवचन’ नाम से उनकी पुस्तक भी काफी लोकप्रिय हुई. लोगों ने उसे खूब पढ़ा और सराहा.

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