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निंदा करना आसान है, संस्थान को मजबूत करना मुश्किल: CJI

नई दिल्ली

देश के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने न्यायपालिका के अंदर और बाहर से उठने वाली विरोध की आवाजों पर निशाना साधते हुए बुधवार को कहा कि निंदा करना बहुत आसान है, लेकिन ‘व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और शिकायतों’ को अलग रखकर एक संस्थान को मजबूत करना मुश्किल है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट बार असोसिएशन की ओर से आयोजित स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में अपने संबोधन में कहा, ‘एक सिस्टम की निंदा, हमला और उसे नष्ट करना बहुत आसान है, लेकिन उसके अच्छे प्रदर्शन में योगदान देना बहुत मुश्किल और चुनौतीपूर्ण है। इसके लिए व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और शिकायतों को अलग रखना पड़ता है।’

यह कार्यक्रम उस समय सुर्खियों में आया था, जब देश के तत्कालीन चीफ जस्टिस टी. एस. ठाकुर ने देश की न्यायपालिका को बेहतर बनाने के लिए सरकार की ओर से फंडिंग की कमी पर नाराजगी जाहिर की थी। निचली अदालतों में लगभग तीन करोड़ मामले लंबित हैं। चीफ जस्टिस मिश्रा ने कहा, ‘सुधारों की सकारात्मक सोच के साथ रचनात्मक कदम उठाने की जरूरत है।’

इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे सीनियर जजों ने संवेदनशील मामलों को ‘सीनियर’ जजों को नजरअंदाज कर ‘जूनियर’ जजों की अगुवाई वाली विशेष बेंचों को सौंपने की चीफ जस्टिस की कार्यप्रणाली पर अपनी नाराजगी सार्वजनिक तौर पर जाहिर की थी। इसके बाद चीफ जस्टिस ने मामलों के रोस्टर में बदलाव किया था।

चीफ जस्टिस मिश्रा ने नागरिकों की पहचान के लिए ‘मानवीय’ आधार होने की जरूरत भी बताई। उनकी यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार की महत्वाकांक्षी आधार योजना की सफलता सुप्रीम कोर्ट में आधार को लेकर चल रहे मामले पर निर्भर करेगी। चीफ जस्टिस उस पांच जजों की बेंच में शामिल हैं जिसने आधार की वैधता पर अपना फैसला सुरक्षित रखा है। चीफ जस्टिस इस वर्ष 2 अक्टूबर को रिटायर हो रहे हैं और उससे पहले बेंच को फैसला देना है।

सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य बेंच असम में विवादास्पद नैशनल रजिस्टर फॉर सिटिजंस (NRC) की निगरानी कर रही है। इस बेंच की अगुवाई देश के अगले चीफ जस्टिस बनने की संभावना वाले जस्टिस रंजन गोगोई कर रहे हैं। लॉ मिनिस्टर रवि शंकर प्रसाद ने इस कार्यक्रम में अपने संबोधन में कहा कि पिछले सात दशकों में भारतीय राजतंत्र की यात्रा ‘इच्छा से लेकर पहचान और अब आकांक्षा और आशा की रही है।’

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए चीफ जस्टिस मिश्रा ने कहा, ‘मैं इसमें केवल यह जोड़ना चाहता हूं कि इस पहचान का आधार मानवता की पहचान पर होना चाहिए, जो मूलभूत और संवैधानिक तौर पर वैध है।’

प्रसाद ने इस अवसर पर न्यायपालिका को संयम बरतने की भी सलाह दी। उन्होंने कहा कि गवर्नेंस को कार्यपालिका पर छोड़ देना चाहिए। उनका कहना था कि कार्यपालिका के कदम उठाने में नाकाम रहने पर ही अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए। अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने अदालतों में बहुत अधिक मामलों की समस्या से निपटने के लिए सभी संबंधित पक्षों से सहयोग करने की अपील की।

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