Thursday , October 29 2020

पाकिस्तान को ले डूबेगी उसकी कभी न पूरी होने वाली सनक?

नई दिल्ली

कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की सनक उसे चौतरफा नुकसान पहुंचा रही है। पाकिस्तान के आंतरिक हालात की गहरी समझ रखनेवाले भारतीय खुफिया विभाग के एक पूर्व अफसर ने यह बात कही है। उन्होंने कहा कि कश्मीर के प्रति पाकिस्तान के पागलपन के कारण ही वहां सेना सुप्रीम पावर बन गई। यही वजह है कि पाकिस्तान में कई आतंकी संगठनों का जन्म हुआ और जिनकी वजह से देश में लोकतंत्र खतरे में पड़ गया है।

रॉ (R&AW) में स्पेशल सेक्रटरी रहे ज्योति के. सिन्हा ने इंडियन डिफेंस रिव्यू में लिखा है, ‘मोहम्मद अली जिन्ना की जल्दी मौत और प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की हत्या के बाद से ही यह सब शुरू हो गया। पाकिस्तान मूवमेंट की इन दोनों हस्तियों ने देश को लोकतांत्रिक दिशा दी थी लेकिन जल्द ही पाक आर्मी अगुआ बन गई और धीरे-धीरे कश्मीर का विषय राष्ट्रीय सनक बन गया। पाक के इस नापाक मिशन के कारण ही सेना सबसे प्रभावशाली और ताकतवर है। पाकिस्तान आगे चलकर ऐसा देश बन गया जहां आर्मी के पास स्टेट है न कि स्टेट के पास आर्मी।’

‘पाक फौज में पंजाबी मुस्लिमों का दबदबा’
पूर्व खुफिया अफसर ने कहा कि पाकिस्तान की सेना में पंजाबी मुस्लिमों का दबदबा है जबकि देश के दूसरे समुदायों की भागीदारी काफी कम है। सिन्हा ने लिखा है, ‘कोई बलूची या सिंधी जनरल नहीं होता है। पश्तून आर्मी अफसर की संख्या भी काफी कम है।’

एक अफसर ने बताया, वह क्यों नहीं बन पाए आर्मी चीफ
एक दिलचस्प घटना के बारे में सिन्हा ने लिखा है, ‘1971 की जंग के फौरन बाद पाक आर्मी के रिटायर्ड जनरल लेफ्टिनेंट जनरल हबीबुल्ला खान बिहार रेजिमेंटल सेंटर, दानापुर कैंट पटना आए हुए थे। उन्होंने सेना में बिहार रेजिमेंट में एक युवा अफसर के तौर पर करियर शुरू किया था। ऐसे में बिहार रेजिमेंटल सेंटर दानापुर के गोल्डन जुबिली सेलिब्रेशन में उन्हें विशिष्ट अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया था। उन्होंने रॉयल इंडियन मिलिटरी कॉलेज, देहरादून के अपने एक बैचमेट से कहा था कि पाकिस्तानी सेना में उनका शानदार रेकॉर्ड होने के बावजूद वह आर्मी चीफ नहीं बन पाए क्योंकि वह पश्तून थे।’

1971 की वह जंग…
ऐंटी-पंजाबी मुस्लिम सेंटिमेंट्स के कारण ही पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली राष्ट्रवाद की भावना ने जोर पकड़ा था। इसी के कारण 1971 की जंग हुई और पाकिस्तान को उसका खामियाजा दो टुकड़े में बंटकर भुगतना पड़ा। दरअसल, पाक पंजाब के लोग बंगाली मुसलमानों को राजनीतिक सत्ता देने से इनकार कर रहे थे।

सिन्हा बताते हैं, ‘1970 के चुनावों में शेख मुजीबुर्रहमान की पार्टी ने पाकिस्तान की नैशनल असेंबली में बहुमत हासिल किया था लेकिन उन्हें देश के प्रधानमंत्री का पद देने से साफ इनकार कर दिया गया। इसके बाद क्या हुआ वह सभी जानते हैं पर अब भी पाक पंजाबी मुसलमानों का नजरिया नहीं बदला है।’

बांग्लादेश आगे, पाकिस्तान है पीछे
सिन्हा ने आगे अपने लेख में लिखा है कि साफ दिखाई दे रहा है कि पाकिस्तान की तुलना में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था बेहतर स्थिति में है। 2017 में बांग्लादेश की GDP ग्रोथ 7.30 फीसदी जबकि पाकिस्तान की 4.71 फीसदी ही थी। पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार अप्रैल 2018 में 17,539 मिलियन डॉलर था और यह तेजी से घट रहा है वहीं, बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार 30,937 मिलियन डॉलर है और यह बढ़ रहा है।

क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?
उन्होंने लिखा कि बांग्लादेश की फौज देश की निर्वाचित सरकार के तहत काम कर रही है और देश में लोकतंत्र स्थिर है जबकि पाकिस्तान का भविष्य अनिश्चित है। सिन्हा आगे कहते हैं, ‘कहा जाता है कि इतिहास खुद को दोहराता है और अगर पाकिस्तान ने सबक नहीं सीखा तो ऐसा होने की पूरी संभावना है। पाकिस्तान के संसाधनों पर वहां की सेना का कब्जा है। बंटवारे के बाद के कश्मीर का उसका अजेंडा पूरा नहीं हुआ है। पाकिस्तान कुछ भी करके कश्मीर हासिल करना चाहता है। यह उसकी सनक नहीं तो क्या है?’

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