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फेक न्यूज पर यूं लगाम कसने की तैयारी में सरकार

नई दिल्ली

केंद्र सरकार भारतीय कानून के तहत इंटरनेट और सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही का मामला सख्त करने के लिए सितंबर तक नई गाइडलाइंस बनाएगी। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सरकार सुनिश्चित करेगी कि ये कंपनियां अफवाहों या अपमानजक कॉन्टेंट को अपने प्लेटफॉर्म्स पर फैलने से रोकने का कदम तेजी से उठाएं।

एक संबंधित अधिकारी ने बताया कि इस कदम के तहत इंफॉर्मेशन टेक्नॉलजी ऐक्ट के सेक्शन 79 के अंतर्गत गाइडलाइंस नोटिफाई की जाएंगी। इससे पहले सरकार ने माना था कि अफवाहों के कारण हुई हिंसा की घटनाओं के मद्देनजर उसने ऐक्शन लेने की जो मांग की थी, उस पर मेसेजिंग प्लेटफॉर्म वॉट्सऐप ने उचित प्रतिक्रिया नहीं दी।

अधिकारी ने कहा, ‘गाइडलाइंस का ड्राफ्ट तैयार है। एक लीगल फर्म उस पर विचार कर रही है। इन्हें सितंबर तक जारी हो जाना चाहिए।’ प्रस्तावित दिशानिर्देशों के मुताबिक, ग्लोबल इंटरनेट और सोशल मीडिया कंपनियों को देश में एक ग्रीवांस ऑफिसर नियुक्त करना होगा, जिसे शिकायतों पर कुछ ही घंटों में ऐक्शन लेने की जिम्मेदारी होगी। इसके अलावा इन कंपनियों को मेसेज का ऑरिजिन पता करने का सलूशन डिवेलप करना होगा।

आईटी ऐक्ट के सेक्शन 79 की इंटरमीडियरी गाइडलाइंस को 2011 में नोटिफाई किया गया था। इनमें कहा गया है कि कंपनियों को ‘ड्यू डिलिजेंस’ करना होगा और इसमें कंपनियों को आपत्तिजनक कंटेंट हटाने के लिए 36 घंटे का वक्त दिया गया था। इनमें कहा गया है कि कंपनियों को अपनी वेबसाइट पर एक ग्रीवांस ऑफिसर का नाम देना होगा। हालांकि इन गाइडलाइंस को कड़ाई से लागू नहीं किया गया।

अभी गूगल और फेसबुक सरीखी इंटरनेट कंपनियों को इंटरमीडियरीज के रूप में क्लासिफाइ किया गया है, जो फैसिलिटेटर की तरह काम करती हैं और इंफॉर्मेशन के मॉडिफिकेशन या क्रिएशन में सक्रियता से भाग नहीं लेती हैं। अधिकारी ने कहा, ‘गेंद अब हमारे पाले में ही है। हमें आईटी ऐक्ट के सेक्शन 79 के तहत गाइडलाइंस पेश करनी हैं। उसके बाद हम वॉट्सऐप या किसी भी अन्य इंटरनेट कंपनी से सवाल-जवाब कर सकते हैं।’ उन्होंने कहा, ‘इनसे हमें नियम लागू कराने की ताकत मिलेगी। अभी वे कहती हैं कि उनके पास एंड टु एंड एनक्रिप्शन है, लिहाजा वे मेसेज का ओरिजिन पता नहीं कर सकतीं।’

इस मामले पर लीगल एक्सपर्ट्स ने कहा कि सर्कुलेट होने वाले मेसेज का ऑरिजिन पता करने का जिम्मा इंटरनेट कंपनियों पर डालने के सरकार के कदम से मामला जटिल हो सकता है क्योंकि कानून सेल्युलर नेटवर्कों पर भेजे जाने वाले टेक्स्ट मेसेज पर भी लागू होगा। लॉ फर्म ट्राईलीगल के पार्टनर राहुल मैथन ने कहा, ‘सरकार इन कंपनियों के अधिकारियों से यह अपेक्षा नहीं कर सकती है कि वे कॉन्टेंट के बारे में कुछ ही घंटों में निर्णय कर लें। इस पर तो निर्णय करने में अदालतों को भी कई साल लग जाएंगे।’

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