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भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कौन बेहतर, मोदी या मनमोहन?

आर्थिक मोर्चे पर देश के प्रदर्शन के आंकड़ों में छोटे-छोटे बदलाव भी राजनीतिक गलियारे में गहमागहमी के कारण बन जाते हैं। हम अभी 10 महत्वपूर्ण आर्थिक पैमाने पेश कर रहे हैं जिनमें किसी पर यूपीए सरकार ने तो किसी पर एनडीए सरकार ने अच्छा प्रदर्शन किया है।

जीडीपी ग्रोथ के मामले में मोदी सरकार मनमोहन सरकार के मुकाबले पिछड़ती दिख रही है। ध्यान रहे कि मनमोहन सरकार के 10 साल के कार्यकाल के मुकाबले मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल की तुलना की गई है। मोदी सरकार के सरकारी खर्चे तो बढ़े हैं, लेकिन निजी खर्जों में गिरावट आई है। यानी, मोदी सरकार ने चार साल में ही मनमोहन सरकार के 10 सालों के मुकाबले ज्यादा खर्च किए।

सकल निश्चित पूंजी निर्माण (ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेंशन) जीडीपी का ही एक अवयव होता है जिससे पता चलता है कि अर्थव्यवस्था में आई नई पूंजी का कितना हिस्सा निवेश किया गया। इसमें नई पूंजी की खपत शामिल नहीं किया जाता। यानी, सरकार, कंपनियां एवं अन्य संस्थानों ने कितना नया निवेश किया, उसका आकलन ही सकल निश्चित पूंजी निर्माण कहलाता है।

बैंक कई तरह के संस्थानों को लोन देते हैं। जब लोन भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) या खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए दिया जाता है तो उसे फूड क्रेडिट कहा जाता है। यानी गैर-खाद्य ऋण में वे बैंक कर्जे आते हैं जिनका फूड सिक्यॉरिटी से लेना-देना नहीं होता है।

सरकार की आमदनी और खर्च में अंतर को वित्तीय घाटा कहा जाता है। कोई अर्थव्यवस्था कितनी सेहतमंद है, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जाता ैह कि वहां वित्तीय घाटा कितना कम है। इस मोर्चे पर मोदी सरकार मनमोहन सरकारी से आगे दिखती है।

मनमोहन सरकार के 10 वर्षों में औसत वार्षिक महंगाई 8.1% रही थी जबकि मोदी सरकार में महज आधा प्रतिशत है।जब बैंकों के पास पैसे कम पड़ जाते हैं तो वे रिजर्व बैंक से कर्ज लेते हैं। रीपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर रिजर्व बैंक उन्हें कर्ज देता है।

हर देश दुनिया के विभिन्न देशों से कुछ सामान खरीदता (आयात करता) है और कुछ सामान उन्हें बेचता (निर्यात करता) है। अगर निर्यात से मिली रकम आयात के लिए खर्च की गई रकम से कम हो तो उसे चालू खाता घाटा कहते हैं।

दुनिया के देशों से खरीद-बिक्री में डॉलर का इस्तेमाल होता है। इस लिहाज से डॉलर का जितना बड़ा भंडार होता है, विदेशों से तेल जैसे जरूरी सामानों के आयात में उतनी ही आसानी होती है। अगर विदेशी मुद्रा भंडार निचले स्तर पर आ जाए तो सरकार के लिए नागरिकों को जरूरी सामान मुहैया कराना मुश्किल हो जाएगा।

अभी रुपये में लगातार गिरावट पर मोदी सरकार विपक्ष के निशाने पर है, आंकड़े बताते हैं कि यूपीए सरकार में रुपये में औसत वार्षिक गिरावट मोदी सरकार के मुकाबले ज्यादा रही थी।

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