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मंटो बड़े या नवाजुद्दीन सिद्दीकी? नंदिता दास की किताब के कवर पर खड़ा हुआ बखेड़ा

नई दिल्ली,

हिंदी सिनेमा की भीड़ में अलग तरह की भूमिका के लिए मशहूर नंदिता दास की एक किताब के कवर पर हिंदी साहित्य में बखेड़ा खड़ा हो गया. दरअसल, अपने समय में सर्वाधिक लोकप्रिय और विवादित साहित्यकार-पत्रकार सआदत हसन मंटो के जीवन पर नंदिता के निर्देशन में “मंटो” नाम से एक फिल्म बनी है. नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने फिल्म में मंटो का किरदार निभाया है. फिल्म के लिए नंदिता ने मंटो की कहानियों और उनकी रचनाओं को खूब पढ़ा.

फिल्म के बाद नंदिता ने “मंटो” की मनपसंद 15 कहानियों का संकलन तैयार किया है. हिंदी और अंग्रेजी में ये संकलन पाठकों के बीच आने को तैयार है. वैसे कुछ प्रतियां मुंबई में बांटी भी गई हैं. हालांकि किताब आने से पहले ही उसके कवर पर विवाद शुरू हो रहा है. दरअसल, किताब के कवर पर मंटो या लेखक की बजाए नवाजुद्दीन की “तस्वीर” को जगह मिली है. जो मंटो का पोस्टर ही है. हिंदी के साहित्यकारों को ये बात नागवार लग रही है. इसे बाजार के आगे एक ईमानदार लेखक की “हत्या” कहा जा रहा है. स्वाभाविक तौर पर सवाल हो रहे हैं कि लेखक “मंटो” बड़े हैं या फिल्म में उनका किरदार निभाने वाले नवाजुद्दीन सिद्दीकी?

सोशल मीडिया पर हिंदी के युवा साहित्यकारों ने आरोप लगाए कि किताब से नवाजुद्दीन का ऐसा क्या जुड़ाव है जो उन्हें कवर पर जगह मिली. कुछ लोगों को उम्मीद नहीं थी कि नंदिता के संपादन में इस तरह की ‘हरकत’ होगी. इसे एक सम्मानित लेखक की उपलब्धियों की कीमत पर किताब बेचने का सस्ता हथकंडा बताया जा रहा है. बताते चलें कि किताब का प्रकाशन, मंटो फिल्म बनाने वाला प्रोडक्शन हाउस और राजकमल प्रकाशन समूह संयुक्त रूप से कर रहा है.

कैसे सामने आया विवाद?
कवर को लेकर विवाद मुंबई में “मंटो” फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग के बाद शुरू हुआ. दरअसल, किताब की कुछ प्रतियां 5 सितंबर 2018 को वितरित की गई थीं. कवर की भनक लगते ही साहित्यकारों का एक धड़ा सोशल मीडिया में इसकी आलोचना करने लगा. इस धड़े में ज्यादातर युवा साहित्यकार, पत्रकार और मंटो को चाहने वाले एक्टिविस्ट हैं.

इस पूरे मामले पर राजकमल प्रकाशन समूह की ओर से कहा गया है कि कवर के जरिए मंटो की छवि को हल्का या अपदस्थ करना मकसद नहीं है. प्रकाशन समूह ने एक लंबे फेसबुक पोस्ट में लिखा, “इसका मकसद मंटो के साहित्य और उन पर बनी फिल्म को ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच पहुंचाना है. इसलिए किताब का फ्रंट कवर फ़िल्म के पोस्टर का ही कुछ बदला हुआ रूप है. किताब के बैक कवर पर फ़िल्म के प्रोडक्शन हाउस का लोगो भी प्रकाशन के लोगो के साथ छपा है. यह किताब विशेष रूप से मंटो फ़िल्म के निर्माण के उपलक्ष्य में ही प्रकाशित हुई है. यह एक स्पेशल एडिशन भर है, न कि रेगुलर एडिशन.” अभी इस पूरे विवाद पर नंदिता या प्रोडक्शन की ओर से कुछ सामने नहीं आया है.

युवा कहानीकार और एक्टिविस्ट संजीव चंदन ने कहा, “चुप्पी साध लेना साहित्यिक जमात की अवमानना है. कुछ लोग भले ही यह तर्क दे रहे हैं कि दुनियाभर में किताबों के कवर पर संबंधित फिल्म या नाटकों की तस्वीर लगी है, लेकिन वे भरमा रहे हैं. किताबों पर बनी फिल्म की तस्वीर लगना एक बात है और लेखक की जगह उसे अभिनीत करने वाले एक्टर की तस्वीर दूसरी बात है.” संजीव सवाल करते हैं – “क्या गांधी की जगह उनके अभिनेता बेन किंग्सले या डा. आंबेडकर की जगह ममूटी या भगत सिंह की जगह बॉबी देओल की तस्वीर लगना ठीक है? यह छवि आगे की पीढ़ी के लिए खतरनाक है.”

लेखक और दिल्ली यूनिवर्सिटी के सांध्य कॉलेज में पढ़ाने वाले प्रभात रंजन आरोपों से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि मंटो चेहरा नहीं रूह हैं, उन्हें खत्म नहीं किया जा सकता. प्रभात के मुताबिक, “क्या मंटो की जमीन इतनी कमजोर है कि उनकी किताब पर एक अभिनेता का चेहरा छप जाने से खिसक जाएगी. हम सब मंटो के किरदार हैं, सारी कहानियां मंटो की हैं. हिंदुस्तान-पाकिस्तान की सरहद को मंटो की कहानियां एक कर देती हैं. दो मुल्कों की अवाम क्या कभी मंटो से मुक्त हो सकती है? मंटो चेहरा नहीं रूह है!”

वैसे किताब के साथ ही मंटो के पहले गाने पर भी विवाद हो सकता है. हो सकता है कि फिल्म में इस्तेमाल रैप में मंटो के लेखन की फिलॉसफी को दर्शाने का अंदाज भी दर्शकों को रास न आए.

कौन हैं मंटो ?
मंटो उर्दू के लेखक-पत्रकार थे. उनका जन्म 11 मई 1912 को अविभाजित भारत में हुआ था. बू, खोल दो, ठंडा गोश्त और चर्चित टोबा टेक सिंह जैसी कहानियों के लिए मंटो याद किए जाते हैं. कहानियों में अश्लीलता के आरोप की वजह से मंटो को मुकदमे भी झेलने पड़े थे. मंटो काफी दिन मुंबई रहे और पाकिस्तान बनने के बाद वहीं चले गए. मंटो ज्यादा दिन नहीं जिए, 1955 में उनका निधन हो गया.

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