लड़की की तरह पला-बढ़ा रामचंद्र कैसे बना नाथूराम, जानें रोचक बातें

मनोहर मालगांवकर देश के एक बड़े लेखक और ब्यूरोक्रेट थे। उन्होंने एक किताब लिखी The Men Who Killed Gandhi। इस किताब में उन्होंने नाथूराम गोडसे के जीवन से जुड़े बहुत से चौंकाने वाले पहलुओं का खुलासा किया है। आज हम उनकी किताब के झरोखे से गोडसे के जीवन की कुछ रोचक बातें जानेंगे…

परिचय
नाथूराम का जन्म 19 मई, 1910 को एक ब्रह्मण परिवार में पुणे के नजीदक एक गांव में हुआ था। उसके पिता विनायक गोडसे पोस्ट ऑफिस में काम करते थे। गांधीजी की हत्या के जुर्म में 15 नवंबर, 1949 को उसे 39 साल की उम्र में फांसी की सजा दी गई थी। उसका पूरा नाम नाथूराम विनायक गोडसे था।

लड़की की तरह गोडसे की परवरिश
किताब में दावा किया गया है कि नाथूराम गोडसे की परवरिश लड़की की तरह हुई। बचपन में उसके नाक में नथ पहनाया गया था। कहते हैं कि नथ पहनने के कारण ही उसको नाथूराम पुकारा जाने लगा। वैसे उसका पूरा नाम नाथूराम विनायक गोडसे था। उसके परिवार के लोगों का मानना था कि गोडसे के पास कुछ दैवीय शक्तियां हैं। उसके घर वाले कहते कि जब भी बचपन में वह अपनी कुलदेवी की मूर्ति के सामने एकाग्रचित्त होकर बैठता तो उसे कुछ तस्वीरें या कुछ लिखा हुआ दिखता। उसके बाद वह ध्यान में चला जाता। घर के लोगों का मानना था कि जब नाथूराम ध्यान में चला जाता था तो कोई सवाल पूछने पर उसके मुंह से खुद देवी जवाब देती हैं।

कारण
नाथूराम के पिता विनायक जब 17 साल के थे तो 1892 में उनका विवाह हो गया। पहले उनको एक लड़का पैदा हुआ और बाद में एक लड़की। पहला लड़का अभी 2 साल का भी नहीं हुआ था कि उसका निधन हो गया। उसके बाद उनको 2 और बेटे हुए जिनकी मौत भी अल्पायु में हो गई। किताब के मुताबिक, तीन बेटे के मरने और एक बेटी को जिंदा रहने से घर के लोगों के बीच एक धारणा बन गई। उनका मानना था कि उनके घर जो लड़का पैदा होता है, उस पर किसी का शाप है। वे मानने लगे कि शाप की वजह से लड़के की मौत हो जाती है। उनको सुझाव दिया गया कि आगे लड़का होने पर उसकी सुरक्षा का एक ही उपाय है। वह यह कि उसका पालन-पोषण एक लड़की की तरह किया जाए। किताब के मुताबिक, इसके बाद विनायक और उनकी पत्नी ने भगवान से प्रार्थनाएं कीं। उन्होंने फैसला किया कि अगली बार उनको लड़का भी पैदा हुआ तो उसकी परवरिश एक लड़की की तरह ही करेंगे। उन्होंने तय कर लिया कि उस लड़के के बायें नथूने में छेद करके एक नथ डाल देंगे। संयोग से 19 मई, 1910 को उनके घर एक लड़का पैदा हुआ। उसका नाम माता-पिता ने रामचंद्र रखा। पूरा नाम रामचंद्र था लेकिन लोगों ने नाम को छोटा करके राम कहना शुरू कर दिया। चूंकि उसका नाक में एक तरफ छेद डालकर नथ पहनाया गया था इसलिए उसको नाथूराम कहा जाने लगा। इस तरह रामचंद्र का नाम नाथूराम पड़ गया।

16 साल के बाद का नाथूराम
किताब में नाथूराम के भाई के हवाले से कहा गया है कि 16 साल के बाद नाथूराम में काफी बदलाव आ गया। अब उसकी रुचि धर्म में नहीं थी। वह दुनिया के अन्य मामलों में दिलचस्पी लेने लगा। अब वह अपने परिवार और कुलदेवी के बीच की कड़ी नहीं रह गया था। उसे तैराकी का काफी शौक था। इसके अलावा वह सामाजिक कार्यों में भी लगा रहता था। किताब के मुताबिक, अकसर उसे गांव के कुओं में गिरे हुए बर्तनों को निकालने, बिल्लियों को बचाने, मरीजों की देखभाल करने, मंदिर के समारोहों और गरीब पड़ोसियों के शादी कार्यक्रमों में सेवा के लिए बुलाया जाता था।

एक रोचक घटना
लेखक ने गोडसे की उन दिनों की एक कहानी लिखी है, जब उसका परिवार लोनावला में रहता था। एक बार एक अछूत बच्चा पानी में गिर गया था जिसे नाथूराम ने बचाया था। जब उसने अपने माता-पिता को इस बारे में बताया तो उसे डांटा गया। उसे कहा गया कि पहले उसको खुद नहाकर शुद्ध कर लेना चाहिए था फिर घर के अंदर आना चाहिए था क्योंकि बच्चे को छूने के कारण वह अपवित्र हो गया है। वैसे उन दिनों ब्राह्मण परिवार में इस तरह की सोच आम बात थी लेकिन नाथूराम इन बातों को नहीं मानता था। लेखक लिखते हैं, ‘बाद में उसने अस्पृश्यता को खत्म करने के लिए काफी संघर्ष किया जो उनके माता-पिता के लिए निराशाजनक था।’

 पौराणिक कथाओं और शास्त्रों को पढ़ने का शौक
मालगांवकर के मुताबिक, नाथूराम उन किताबों को खूब पढ़ता था जिसमें उसकी दिलचस्पी थी। पौराणिक कथाओं, शास्त्रों और इतिहास पढ़ने का उसे बहुत शौक था। लेकिन वह सभी चीज मराठी भाषा में ही पसंद करता था क्योंकि उसे इंग्लिश बहुत मुश्किल लगती थी। वह इंग्लिश में होने के कारण अपने स्कूल का भी काम नहीं करता जिस वजह से वह दसवीं क्लास में फेल हो गया था। पुस्तक के मुताबिक, नाथूराम के पिता ने बहुत कोशिश की कि वह फिर से परीक्षा दे लेकिन नाथूराम ने आगे पढ़ाई नहीं की। वह बाद में वीर सावरकर के विचारों से प्रभावित हुआ। उसने कारपेंट्री पर अपना हाथ आजमाया और पूना (अब पुणे) शिफ्ट होने से पहले टेलर का काम करता था। बाद में उसने नारायण आप्टे के साथ एक मराठी पत्रिका निकालना शुरू किया। मराठी पत्रिका का नाम अग्रामी था। किताब में दावा किया गया है कि अग्राम के दफ्तर में ही गांधीजी की हत्या का षडयंत्र रचा गया था।

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