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सिंधु पर भारत-पाक करेंगे बात, जानें क्या है संधि, क्या विवाद

ई दिल्ली

सिंधु जल समझौते पर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से विवाद है। दोनों देश इस मसले को सुलझाने के लिए तमाम प्रयास करते रहे हैं। पाकिस्तान में इमरान खान की नई सरकार आने के बाद एकबार फिर दोनों देश इस मसले पर चर्चा करने वाले हैं। हालांकि आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के कड़े रुख को देखते हुए इस बैठक के परिणाम पर आशंकाएं भी हैं। भारत इस मुलाकात को ‘सिंधु जल समझौते’ के तहत जरूरी बता रहा है वहीं, पाकिस्तान किशनगंगा प्रॉजेक्ट पर भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है। आइए जानते हैं सिंधु जल समझौते के बारे में सबकुछ…

सिंधु समझौता क्या है
1947 में आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के मसले पर जोरदार खींचतान चली और नहरों के पानी पर खूब विवाद हुआ। विभाजन के बाद नहरों के पानी को लेकर पाकिस्तान सशंकित हो गया था। 1949 में एक अमेरिकी एक्सपर्ट डेविड लिलियेन्थल ने इस समस्या को राजनीतिक की जगह तकनीकी तथा व्यापारिक स्तर पर सुलझाने की सलाह दी। लिलियेन्थल ने दोनों देशों को राय दी कि वे इस मामले में विश्व बैंक से मदद भी ले सकते हैं। सितंबर 1951 में विश्व बैंक के अध्यक्ष यूजीन रॉबर्ट ब्लेक ने मध्यस्थता करना स्वीकार भी कर लिया। सालों चली बातचीत के बाद 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच जल पर समझौता हुआ। इसे ही 1960 की सिन्धु जल संधि कहते हैं।

इस संधि पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने रावलिपिंडी में दस्तखत किए थे। 12 जनवरी 1961 से संधि की शर्तें लागू कर दी गईं थी। संधि के तहत 6 नदियों के पानी का बंटवारा तय हुआ, जो भारत से पाकिस्तान जाती हैं। 3 पूर्वी नदियों (रावी, व्यास और सतलज) के पानी पर भारत का पूरा हक दिया गया। बाकी 3 पश्चिमी नदियों (झेलम, चिनाब, सिंधु) के पानी के बहाव को बिना बाधा पाकिस्तान को देना था। संधि में तय मानकों के मुताबिक भारत में पश्चिमी नदियों के पानी का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इनका करीब 20 फीसदी हिस्सा भारत के लिए है।

बातचीत से क्या हैं उम्मीदें
भारत की पाकिस्तान की इमरान खान सरकार के साथ पहली अधिकारिक मुलाकात अगले हफ्ते ही इस्लामाबाद में होने वाली है। स्थायी सिंधु आयोग (पीआईसी) की इस मुलाकात में दोनों देशों के अधिकारी सिंधु जल मामले को लेकर चर्चा करेंगे। भारत इस मुलाकात को ‘सिंधु जल समझौते’ के तहत जरूरी बता रहा है। दोनों तरफ से ‘सार्थक’ बातचीत की इच्छा जाहिर किए जाने के बावजूद व्यापक बातचीत को लेकर कोई चर्चा नहीं है। हालांकि भारत यह बात कई बार साफ कर चुका है कि जब तक पाकिस्तान भारत के खिलाफ काम कर रहे आतंकी समूहों पर कोई कार्रवाई नहीं करता तब तक कोई व्यापक बातचीत संभव नहीं है। भारत के दल का नेतृत्व पीके सक्सेना करेंगे, वहीं पाक की तरफ से सैयद मेहर अली शाह को इसकी आयुक्त बनाया गया है।

2017 में सिंधु नदी जल संधि पर भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के बीच गुरुवार से विश्व बैंक के वॉशिंगटन स्थित मुख्यालय में बातचीत हुई थी। यह दोनों पक्षों के बीच दूसरे दौर की बातचीत थी, इससे पहले दोनों पक्ष अगस्त में मिले थे। सचिव स्तर की बातचीत बेहतर माहौल में हुई थी और उस समय यह तय किया गया था कि सितंबर में दोबारा बातचीत होगी। हालांकि हाल के दिनों में इस मसले पर दोनों देशों के बीच फिर से बयानबाजी हो रही है।

विवाद क्या है
पाकिस्तान वर्ल्ड बैंक के सामने जम्मू-कश्मीर में भारत के किशनगंगा और राटले पनबिजली परियोजना का मुद्दा कई बार उठा चुका है। पाक ने रातले, किशनगंगा सहित भारत द्वारा बनाए जा रहे 5 पनबिजली परियोजनाओं के डिजाइन को लेकर चिंता जाहिर की थी और वर्ल्ड बैंक से कहा था कि ये डिजाइन सिंधु जल समझौते का उल्लंघन करते हैं। इन परियोजनाओं को लेकर पाकिस्तान ने साल 2016 में विश्व बैंक को शिकायत कर पंचाट के गठन की मांग की थी। पाकिस्तान लगातार जम्मू-कश्मीर में निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं का विरोध कर रहा है। उसका कहना है कि ये प्रॉजेक्ट्स भारत के साथ हुए सिंधु जल समझौते के अनुरूप नहीं हैं। जबकि, भारत का कहना है कि परियोजनाएं समझौते का उल्लंघन नहीं करती हैं और वर्ल्ड बैंक को एक निष्पक्ष एक्सपर्ट नियुक्त करना चाहिए।

उड़ी में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने संकेत दिए थे कि पाकिस्तान पर आतंकवाद के खिलाफ सख्त कदम उठाने का दबाव बनाने के लिए वह सिंधु जल समझौते का इस्तेमाल कर सकता है। सिंधु का पानी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए रीढ़ की हड्डी जैसा है। पाकिस्तान मुख्य तौर पर कृषि प्रधान देश है और इसकी खेती का 80 फीसद हिस्सा सिंचाई के लिए सिंधु के पानी पर निर्भर है। भारत ने अभी तक सिंधु के अपने हिस्से के पानी का बहुत इस्तेमाल नहीं किया था।

नरेंद्र मोदी सरकार का रुख
दिसंबर 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस संबंध में पंजाब के बठिंडा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि एक-एक बूंद पानी रोककर भारत के किसानों तक पहुंचाया जाएगा। इसके पहले 27 सितंबर को पीएम मोदी के सिंधु नदी जल समझौते की समीक्षा करने के फैसले के बाद से इस प्रॉजेक्ट को शुरू किए जाने की कवायद चल रही थी। हालांकि इस चेनाब प्रोजेक्ट से पहले सरकार स्वालकोट (1,856 मेगावॉट), पाकुल दुल (1,000 मेगावॉट) और बुरसर (800 मेगावॉट) प्रोजेक्ट को शुरू करेगी। एक अधिकारी ने कहा था, ‘भारत अब सिंधु के ज्यादा से ज्यादा पानी का इस्तेमाल करना चाहता है। ज्यादा पानी इस्तेमाल करना ही अब भारत की प्रमुखता है। इसीलिए अब तक सिंधु से जुड़े लंबित प्रॉजेक्ट्स को जल्द से जल्द पूरा किया जाने की तैयारी की जा रही है।’ 2016 में ही पीएम नरेंद्र मोदी ने सिंधु जल संधि पर हुई बैठक के दौरान कहा है कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते हैं। इस बयान को पाकिस्तान के लिए कड़े संदेश के तौर पर देखा गया था।

कब-कब मिले अधिकारी
संधि में तय मानकों के मुताबिक भारत में पश्चिमी नदियों के पानी का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इनका करीब 20 फीसदी हिस्सा भारत के लिए है। संधि पर अमल के लिए सिंधु आयोग बना, जिसमें दोनों देशों के कमिश्नर हैं। वे हर साल मिलते हैं और विवाद निपटाते हैं।

क्या कर सकता है भारत
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के पास समझौते को तोड़ने के अलावा दूसरे विकल्प भी हैं। इसमें पश्चिमी नदियों के पानी का खुद इस्तेमाल और सिंधु जल कमिशन की बैठकों को निरस्त करने के कदम शामिल हैं। इन उपायों से भी भारत अपने पड़ोसी देश पर दबाव बना सकता है।

1960 में दोनों देशों के बीच हुए सिंधु जल समझौते में छह नदियों ब्यास, रावी, सतलुज, सिंधु, चिनाब और झेलम के पानी के वितरण और इस्तेमाल करने के अधिकार शामिल हैं। इस संधि के तहत ‘तीन पूर्वी नदियों’ ब्यास, रावी और सतलुज के पानी का इस्तेमाल भारत बिना किसी बाधा के कर सकता है। वहीं तीन ‘पश्चिमी नदियां’ सिंधु, चिनाब और झेलम पाकिस्तान को आवंटित की गई हैं। हालांकि भारत इन पश्चिमी नदियों के पानी का भी इस्तेमाल अपने घरेलू कामों, सिंचाई और पनबिजली के लिए कर सकता है।

भारत को समझौते के तहत पश्चिमी नदियों से 36 लाख एकड़ फीट (MAF) पानी स्टोर करने का अधिकार है। इन पश्चिमी नदियों के पानी से 7 लाख एकड़ जमीन में लगी फसलों की सिंचाई कर सकता है। हालांकि भारत ने अब तक स्टोरेज की सुविधा विकसित नहीं की है। भारत पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए अफगानिस्तान की भी मदद ले सकता है। अफगानिस्तान से काबली नदी के पानी को रोकने के लिए बहाव पर निर्माण की बात कही जा सकती है। यह नदी सिंधु बेसिन के रास्ते पाकिस्तान में जाती है।

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