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‘2014 जैसी नहीं है 2019 की जंग, BJP को RSS का बैकअप जरूरी’

नई दिल्ली

जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर वॉल्टर के. एंडरसन और अमेरिकी मूल के राइटर श्रीधर डी. दामले इन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर लिखी किताब को लेकर चर्चा में हैं. ‘द आरएसएस: ए व्यू टू दि इनसाइड’ नाम की किताब में दोनों ने संघ से जुड़े ऐसे तथ्यों और बातों को उजागर किया है, जिससे बीजेपी के नेतृत्व में मौजूदा सरकार की दशा और दिशा दोनों साफ होती है. इस किताब के सह-लेखक श्रीधर दामले ने संघ को न सिर्फ दशकों तक करीब से देखा है, बल्कि इसके कई सर-संघचालक (संघ प्रमुख) और प्रचारकों के साथ काफी वक्त भी बिताया है.

अपने इसी अनुभव के आधार पर दामले बड़े आत्मविश्वास के साथ संघ के बारे में ऐसी तमाम बातें कह जाते हैं, जिन्हें कहने के लिए संघ से जुड़ा कोई भी शख्स शायद साहस न कर पाए. किताब के ओपनिंग रिमार्क्स में एंडरसन और दामले लिखते हैं, ‘भारत को समझने के लिए आरएसएस को समझना जरूरी है.’

अपनी किताब को लेकर श्रीधर दामले ने News18 से बातचीत की. आने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर दामले ने कहा, ‘ 2019 की लड़ाई 2014 की जंग जैसी नहीं होगी. चीजें काफी बदल चुकी हैं. बीजेपी को दोबारा सत्ता में लाने के लिए संघ को पूरा जोर लगाना होगा.’

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच कैसे रिश्ते हैं? इस सवाल के जवाब में दामले कहते हैं, ‘2014 के आम चुनाव के लिए कैंपेन खत्म होने पर नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में आधी रात को मोहन भागवत से मुलाकात की. भागवत ही वो आखिरी शख्स थे, जिससे 2014 का चुनावी कैंपेन खत्म होने के बाद मोदी ने मुलाकात की थी. सांकेतिक रूप से यह एक अनौपचारिक मुलाकात थी.

दामले बताते हैं, ‘मोदी भी संघ के प्रचारक रह चुके हैं. इसलिए वह बखूबी जानते हैं कि सर-संघचालक का पद कितना सम्मानजनक होता है. अगर आरएसएस के कुछ कार्यक्रमों पर गौर करें, तो पाएंगे कि भागवत ने कई मौकों पर पीएम मोदी की पॉलिसी को लेकर उनकी आलोचना की है. लेकिन, ये आलोचना पूर्व संघ प्रमुख सुदर्शन और पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के समय से काफी अलग है. वाजपेयी के शासनकाल में संघ ने उन्हें और उनके मंत्रियों को ‘असक्षम’ और ‘गद्दार’ कहा था. लेकिन, पीएम मोदी के साथ ऐसा कभी नहीं हुआ. इससे साफ समझा जा सकता है कि मोहन भागवत और पीएम मोदी के बीच कैसे रिश्ते हैं.

श्रीधर दामले के मुताबिक, ‘संघ कभी एक पार्टी तक सिमट कर नहीं रहा. राजनीतिक परिपेक्ष्य में संघ ने विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ संपर्क बनाए रखा. इसमें खासतौर पर कांग्रेस भी शामिल थी. यहां तक कि आजादी के बाद भी संघ अपने कार्यक्रमों में केएम मुंशी गंगाराव देशपांडे और सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे कांग्रेसी नेताओं को आमंत्रित करता रहा है. आरएसएस के कार्यक्रमों में गैर-संघी लोगों को आमंत्रित करना कोई नई बात नहीं है. हाल ही में संघ ने अपने कार्यक्रम में कांग्रेसी नेता और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को बुलाया था.

दामले ने बताया, ‘संघ ने हमेशा शिक्षा को अपने मूल मिशन के रूप में देखा है. लगभग सभी इसके सहयोगी इसके कुछ रूपों में संलग्न हैं. कुछ प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्तरों पर स्कूलों के प्रबंधन के विशिष्ट मिशन के साथ-साथ बड़े पैमाने पर इनकी शाखाएं चलती हैं. 1980 के दशक से आरएसएस ने अपने सहयोगियों को अपने हिंदुत्व संदेश को ऐसे तरीकों से पैकेज करने के लिए शैक्षिक प्रयोगों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया है, जो इसे अधिक प्रासंगिक बनाते हैं.’

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