अयोध्या मध्यस्थता : बीजेपी को अब भी दिख रहा मौका

नई दिल्ली

बीजेपी और आरएसएस भले ही सुप्रीम कोर्ट के मध्यस्थता के फैसले की सफलता को लेकर ज्यादा आशावान न हों, लेकिन बीजेपी को अंदरखाने लग रहा है कि इन आठ हफ्तों में इस पर चर्चाओं की वजह से चुनाव के दौरान मंदिर मुद्दे का फायदा उसे मिल सकता है। बीजेपी के सीनियर नेता और सरकार के मंत्री भले ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर किसी भी टिप्पणी से बच रहे हों, लेकिन पार्टी के निचले स्तर के नेताओं की तरफ से इस मामले पर बयानबाजी होती रहेगी। यह जानकारी बीजेपी से जुड़े एक सूत्र ने दी है।

इकॉनमिक टाइम्स से बातचीत में बीजेपी के कई नेताओं ने कहा कि पूर्व में की गई मध्यस्थता की कोशिशों का भी कोई नतीजा नहीं निकला है। 1990 में पीएम रहते हुए चंद्र शेखर ने अधिकारिक तौर पर एक कमिटी बनाई थी। इस कमिटी में शरद पवार और भैरो सिंह शेखावत सदस्य थे। इस कमिटी को सभी पार्टियों से बात कर रास्ता तलाशने को कहा गया था। लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला। कांग्रेस नेता और पूर्व पीएम पीवी नरसिम्हा राव ने भी अपने कार्यकाल में कांची, द्वारका और पुरी पीठ के शीर्ष नेतृत्व के जरिए इस मामले को सुलझाने का प्रयास किया था, लेकिन वह भी बेनतीजा रहा। दोनों ही प्रयास बाबरी विध्वंस (6 दिसंबर 1992) के पहले के हैं। तब से अब तक मतभेदों की खाई काफी बड़ी हो चुकी है। ऐसे में बीजेपी को लगता है कि दशकों से लंबित पड़े इस मामले में इन आठ हफ्तों में कोई नतीजा आने की उम्मीद न के बराबर है।

बाबरी विध्वंस के बाद कोर्ट की तरफ से दो सुझाव आए, लेकिन कामयाब नहीं हुए। अगस्त 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों से इसका समाधान निकालने को कहा था। अयोध्या मामले के पक्षों के सभी वकीलों ने इस सुझाव से इनकार कर दिया था। मार्च 2017 में चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने भी कहा था कि यह आस्था और धर्म का मामला है, यह मध्यस्थता के जरिए ही सुलझाया जा सके तो बेहतर होगा।

हालांकि, बीजेपी के कई नेताओं को लगता है कि बीजेपी के लिए सबसे अच्छी बात तो यह होती कि मंदिर का निर्माण शुरू हो जाता, लेकिन चुनाव के दौरान इसकी चर्चा से भी पार्टी को फायदा हो सकता है। वीएचपी और अन्य हिंदूवादी संगठनों की कोशिश होगी कि मीडिया में इस मुद्दे पर बात होती रहें। बीजेपी और इसके सहयोगी की कोशिश है कि जनता के बीच यह संदेश जाए कि बीजेपी के कार्यकाल में यह मामला समाधान के करीब पहुंच गया है। हालांकि बीजेपी के कुछ नेताओं ने इस मुद्दे पर पार्टी की गंभीरता को लेकर भी चिंता जाहिर की है।

उत्तर भारत में मंदिर मुद्दा बीजेपी की लिस्ट में बना रहेगा। 1989 से लगातार बीजेपी इस मुद्दे को अपने घोषणा पत्र में रखती रही है, ऐसा इस बार भी होगा। बीजेपी को मिले फीडबैक से पता चला है कि हिंदी बेल्ट के ग्रामीण इलाकों में अब भी यह मुद्दा गरम है। चुनाव के दौरान भी बीजेपी को जहां संठित विपक्ष और सत्ता विरोधी लहर का सबसे ज्यादा सामना करना है, वहां पार्टी मंदिर मुद्दे को भुनाने की पूरी कोशिश करेगी।

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