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अयोध्या विवाद: मध्यस्थता से हल के पहले भी हुए थे प्रयास, लेकिन रहे बेनतीजा

नई दिल्ली

पिछले 150 से भी ज्यादा वर्षों से अदालतों में लंबित अयोध्या विवाद का हल ढूंढने के लिए एक बार फिर मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू हो रही है। इस बार, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मध्यस्थता होने वाली है। इसके लिए कोर्ट ने रिटायर्ड जस्टिस की अध्यक्षता में 3 मध्यस्थों का पैनल गठन किया है। सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता पैनल को 8 हफ्ते के अंदर सभी पक्षों से बातचीत करके मामले का सर्वमान्य हल सुझाने का प्रयास करने को कहा है। 4 हफ्ते में पैनल को सुप्रीम कोर्ट में प्रोग्रेस रिपोर्ट पेश करना है। वैसे, यह पहली बार नहीं है कि अयोध्या विवाद को मध्यस्थता के जरिए हल करने की कोशिश की जा रही है। इससे पहले भी कई अनौपचारिक प्रयास हो चुके हैं लेकिन कोई हल नहीं निकल पाया। आइए नजर डालते हैं ऐसे ही कुछ प्रयासों पर।

चन्द्रशेखर के पीएम बनने के बाद
अयोध्या विवाद का मध्यस्थता से हल निकालने की कोशिश तो 1992 में बाबरी मस्जिद के गिराए जाने से पहले भी हुए थे। नवंबर 1990 में चन्द्रशेखर जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अयोध्या विवाद को हल करने के लिए गंभीर पहल की। उन्होंने मध्यस्थता के जरिए समाधान निकालने के लिए एक कमिटी का गठन किया, जिसमें शरद पवार और राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत शामिल थे। हालांकि, चन्द्रशेखर सरकार टिक ही नहीं पाई, जिस वजह से मध्यस्थता की कोशिश नाकाम हो गई।

नरसिंह राव के दौर में
चन्द्रशेखर के बाद केंद्र में पी. वी. नरसिंह राव के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। राव के दौर में भी बातचीत के जरिए अयोध्या विवाद के समाधान की कोशिश की गई। पी. वी. नरसिंह राव ने कांची, द्वारका और पुरी के शंकराचार्यों को इसकी जिम्मेदारी दी लेकिन कोई हल नहीं निकल सका।

हाई कोर्ट ने भी दिया था विकल्प
अगस्त 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों से पूछा कि क्या वे मध्यस्थता के जरिए समाधान निकालने की कोशिश करेंगे। लेकिन वकीलों ने मध्यस्थता की किसी भी कोशिश से साफ इनकार कर दिया।

2017 में भी हुई कोशिश
मार्च 2017 में भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जे. एस. खेहर ने मामले से जुड़े सभी पक्षों को बातचीत के जरिए हल निकालने का सुझाव दिया था। उन्होंने सभी पक्षों से कहा कि वे आपसी बातचीत से और थोड़ा लचीला रुख अपनाकर विवाद को खत्म करें। सीजेआई खेहर ने अयोध्या विवाद को भावनाओं और धर्म से जुड़ा मामला बताते हुए कहा इसे मध्यस्थता के जरिए ही हल किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने व्यक्तिगत स्तर पर विवाद को सुलझाने की कोशिश की। उन्होंने अयोध्या का दौरा भी किया और संबंधित पक्षकारों से मुलाकात की। हालांकि, यह प्रयास भी विफल रहा।

इस बार सुप्रीम कोर्ट ने बनाई है मध्यस्थता कमिटी
भले ही अयोध्या विवाद का मध्यस्थता के जरिए समाधान की पिछली कोशिशें नाकाम रही हों, लेकिन इस बार यह कोशिश अनौपचारिक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने 3 सदस्यों वाली मध्यस्थता कमिटी का गठन किया है। कमिटी के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एफ. एम. कलीफुल्ला हैं। अन्य दो सदस्यों में आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पांचू शामिल हैं। यह संयोग ही है कि मध्यस्थता पैनल में शामिल तीनों ही नाम तमिलनाडु से ताल्लुक रखते हैं। जस्टिस कलीफुल्ला ने शुक्रवार को कहा भी कि मामले को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुझलाने की हर मुमकिन कोशिश की जाएगी। श्री श्री और पांचू भी मध्यस्थता को लेकर आशावादी हैं। श्री श्री रविशंकर ने कहा कि अगर मध्यस्थता से यह समस्या हल हो जाए तो देश के लिए बहुत ही अच्छा होगा। इसी तरह मध्यस्थता के एक्सपर्ट माने जाने वाले वरिष्ठ वकील श्रीराम पांचू ने भी उम्मीद जताई कि इस बेहद गंभीर जिम्मेदारी को वह पूरी तरह निभाएंगे और समाधान निकालने की कोशिश करेंगे।

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