रोजगार से लेकर राफेल तक घूमेगा ‘सियासी रथ’ का ‘पहिया’

लखनऊ

लोकसभा चुनाव का बिगुल बज उठा है। इसके साथ ही पार्टियों ने अपने मुद्दे जनता के बीच ले जाने शुरू कर दिए हैं। सत्ता के वादे बनाम विपक्ष के मुद्दों की लड़ाई का अंजाम क्या होगा यह तो 23 मई को चुनावी नतीजे घोषित होने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि अब अगले साठ दिनों से ज्यादा बात होगी राफेल की। बेरोजगार होते युवाओं पर मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाएगा। एयर स्ट्राइक चर्चा में होगी। किसानों की आय पर फिर से दावे और वादे होंगे। इन तमाम बातों के बीच प्रदेश के 14 करोड़ 40 लाख मतदाता यह फैसला लेंगे कि वे किसके साथ हैं। आइए जानते हैं वे मुद्दे जो चुनाव की दशा और दिशा तय करेंगे।

एयर स्ट्राइक
बीजेपी इस मसले पर सबसे ज्यादा बात करना चाहेगी। पुलवामा से शुरू होने वाली उसकी बातों में देशभक्ति का रस भी आएगा। हवाई हमले में पाकिस्तान की लाचारी भी बताई जाएगी। पिछले चुनाव में एक के बदले दस सिर लाने का बयान कितना चर्चित रहा था, यह किसी से छुपा नहीं है। कुछ इसी तर्ज पर पाकिस्तान की सीमा में जाकर दुश्मनों को ताकत का अहसास कराने का दावा होगा।

राफेल
बीते छह महीने से विपक्ष का सबसे ज्यादा हमला राफेल पर ही रहा। शायद ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का कोई हालिया भाषण ऐसा रहा हो, जिसमें उन्होंने इस मसले पर सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमले न किए हों। ‘चौकीदार चोर है’ का नारा इस पूरे सियासी समर में छाया रहेगा। हालांकि यह कितना असरदार और जनता को लुभाने वाला होगा, यह तो वक्त ही बताएगा।

राम मंदिर
किसी दौर में बीजेपी के लिए संजीवनी बना राम मंदिर का मसला एक बार फिर धार्मिक तौर लुभाए जा सकने वाले वोटरों के बीच खासा चर्चा का विषय है। एक बड़ा तबका राम मंदिर पर केंद्र सरकार द्वारा अपना फैसला साफ न कर पाने की वजह से नाराज है। इस नाराजगी को सरकार भी भांप रही है। यही वजह है कि आरएसएस सीधे तौर पर केंद्र सरकार का इसमें बचाव कर रहा है। चुनाव की अधिसूचना जारी होने के कुछ ही घंटे पहले आरएसएस के सहकार्यवाह भइयाजी जोशी ने कहा कि राम मंदिर पर बीजेपी की प्रतिबद्धता को लेकर हमारे मन में कोई शंका नहीं है।

बेरोजगारी
यह विपक्ष का सबसे पसंदीदा मसला होगा। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर तमाम सरकारी रिपोर्ट ही सरकार के खिलाफ हैं। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल इसे सरकार की नाकामी के तौर पर जनता के सामने रखेंगे। इस मसले का इस्तेमाल चुनावी भाषणों में कांग्रेस कितना करेगी, इसका अंदाजा उसी घोषणा से लगाया जा सकता है, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने वादा किया है कि अगर केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनती है तो युवाओं को न्यूनतम आय की गारंटी दी जाएगी।

अमीर बनाम किसान
बीते पांच साल में नीरव मोदी, विजय माल्या, मेहुल चोकसी समेत अन्य कई ऐसे बड़े कारोबारी रहे जो बैंकों से बड़ी रकम लेकर देश से भाग गए। केंद्र सरकार पर आरोप हैं कि उसने बड़े उद्योगपतियों का कर्जा भी माफ किया। लेकिन किसानों की कर्जमाफी पर उनकी चुप्पी बरकरार रही। विपक्ष के लिए यह मसला रहा। राहुल गांधी इसे अमीर बनाम गरीब की लड़ाई के तौर पर सामने रखते रहे। हालांकि बीजेपी किसानों की आय दोगुनी करने का दावा कर रही है। किसानों के खातों में छह हजार रुपये सालाना देना भी उसका वह दांव होगा, जिसे बीजेपी गिनाने से चूकेगी नहीं।

सामान्य वर्ग आरक्षण
चुनावी मोड में आने से ऐन पहले राम मंदिर और एससी-एसटी ऐक्ट में किए संशोधन से नाराज सामान्य वर्ग के लिए दस फीसदी आरक्षण की व्यवस्था केंद्र सरकार ने की। बीजेपी इसे एक उपलब्धि के तौर पर जनता के बीच रख रही है। चुनावी मुद्दे में इसपर बात होना तय है। बीजेपी इस कदम से ब्राह्मण वोटरों को अपने पाले में करने की कोशिश करेगी।

एससी-एसटी ऐक्ट में संशोधन
एससी-एसटी ऐक्ट में मुकदमा दर्ज होते ही गिरफ्तारी पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सरकार ने ऐक्ट में संशोधन कर दिया था। बीजेपी ने इससे यह संदेश देने की कोशिश की कि वह दलितों की हिमायती है। मायावती के दलित वोट बैंक में सेंधमारी के लिए बीजेपी हर चुनावी मंच पर इसका जिक्र जरूर करेगी। यह ऐसा मसला होगा, जिसपर विपक्ष का सरकार के खिलाफ जाना भी आसान नहीं होगा।

13 पॉइंट रोस्टर
विश्वविद्यालयों में नौकरी के लिए आए 13 पॉइंट रोस्टर पर बढ़ती नाराजगी को देखते हुए केंद्र सरकार ने इसे वापस ले लिया और फिर से 200 पॉइंट रोस्टर लागू कर दिया। इससे बीजेपी ने विपक्ष के हाथ आते इस मुद्दे को खत्म कर दिया। 13 पॉइंट रोस्टर लागू होने के बाद सरकार के सहयोगी दल भी बीजेपी के खिलाफ आ गए थे, विपक्ष तो इसे मुद्दे के तौर पर उठा ही रहा था। अब सरकार इस व्यवस्था को खत्म करना भी अपनी उपलब्धि के तौर पर गिनाएगी।

जनता ने सर्वे में बताया सरकार का प्रदर्शन औसत से नीचे
एडीआर ने हाल ही में यूपी में सर्वे की रिपोर्ट जारी कीं। इसमें 40,000 लोगों पर सर्वे किया गया था। एडीआर ने सर्वे में जो नतीजे पाए, उनके मुताबिक सरकार का प्रदर्शन औसत से नीचे था। एडीआर ने 31 मसलों पर सरकार के काम-काज का जायजा लिया था। रिपोर्ट के मुताबिक जब मतदाताओं से वोट करने के लिए उनके मसले पूछे गए तो उन्होंने सबसे ज्यादा प्राथमिकता बेहतर रोजगार के अवसर को दी।

सर्वे में शामिल 42.82% लोगों के लिए यह सबसे अहम मसला था। बेहतर स्वास्थ्य देखभाल को 34.56% लोगों ने दूसरा सबसे जरूरी मुद्दा बताया। जबकि तीसरा सबसे बड़ा मुद्दा कानून व्यवस्था का था। इसे 33.37% लोगों ने सबसे तरजीह दी। जबकि इन मसलों पर जब लोगों से सरकार को रेटिंग देने के लिए कहा गया तो उन्होंने सरकार को रोजगार के मसले पर पांच में 2.06 नंबर दिए, जबकि स्वास्थ्य के लिए 2.64 और कानून व्यवस्था के लिए 2.56 नंबर दिए।

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