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संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की राह का सबसे बड़ा रोड़ा बना चीन, एशिया में ड्रैगन का नापाक गेम प्‍लान

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बीजिंग/ वॉशिंगटन

भारत के दोस्‍त रूस ने एक बार फिर से खुलकर संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद में भारतीय दावेदारी का समर्थन किया है। भारत में रूसी राजदूत डेनिस अलिपोव ने शनिवार को कहा कि रूस का मानना है कि भारत को सुरक्षा परिषद में अगर स्‍थायी सदस्‍यता दी जाती है तो इससे संतुलन स्‍थापित होगा। यह पूरी दुनिया के हित में भी होगा। एक तरफ रूस जहां भारत का खुलकर समर्थन कर रहा है, वहीं चीन भारत की संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद की स्‍थायी सदस्‍यता की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बन गया है। विश्‍लेषकों के मुताबिक चीन की कोशिश है कि वह एशिया से अकेले ही संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद में स्‍थायी सदस्‍य बना रहे और भारत को उसमें घुसने नहीं दिया जाए। यही नहीं भारत की दावेदारी का सुरक्षा परिषद के अन्‍य गैर स्‍थायी सदस्‍यों की ओर से भी विरोध हो सकता है।

यह घटनाक्रम चीन और भारत में बढ़े हुए तनाव और प्रतिस्पर्धा के बीच हो रहा है, जो विकासशील दुनिया में नेतृत्व के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। नई दिल्ली ने बीजिंग को अपने भूगोलीय हितों के लिए एक चुनौती माना है और भारत ने अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध विकसित किए हैं। चीन और भारत में जून 2020 से पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में सीमा विवाद चल रहा है। इसका भारत-चीन के द्विपक्षीय संबंधों पर दबाव बना रहता है। भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया में कहा था कि भारत निश्चित रूप से स्थायी सदस्यता के लक्ष्य को प्राप्त करेगा। उन्‍होंने कहा कि मैं 100 प्रतिशत यकीन दिलाता हूं कि हम वहां पहुंचेंगे। लेकिन मैं आपको यह भी कहूंगा कि हम इसे आसानी से नहीं प्राप्त करेंगे क्योंकि दुनिया प्रतिस्पर्धा से भरी पड़ी है।

सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए क्‍या है प्रक्रिया
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सुधार प्रक्रिया कठिन है। इसके लिए उसके 15 सदस्यों में से कम से कम नौ का समर्थन जरूरी है। इसके अलावा ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, रूस और अमेरिका के पांच स्थायी सदस्यों की सहमति की आवश्यकता होती है। विश्लेषकों का कहना है कि चीन के विरोध पीछे वजह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के बीच अकेले ही एशियाई प्रतिनिधि बनने की कुटिल इच्छा है। चीन में भारत के राजदूत रहे आशोक कांत ने न्यूजवीक को बताया कि बीजिंग ने नई दिल्ली की स्‍थायी सदस्‍य बनने की इच्‍छा को रोकने के लिए कई प्रयास किए हैं जबकि ऊपर से केवल खोखले आश्वासन दिए हैं।

कांत ने कहा, ‘व्‍यवहार में हमने पाया है कि चीन ने सक्रिय रूप से सुरक्षा परिषद में बदलाव का कड़ा विरोध किया है और भारत का प्रयास भी चीन की दीवार के विरोध के सामने रुक गया है। हमने चीन के व्‍यवहार को इस रूप से लिया है कि वह भारत के उदय का समर्थन नहीं करता है। चीन एक और विकासशील देश के साथ स्‍पेस साझा करने के लिए तैयार नहीं है। वह अपने स्‍टेटस को सुरक्षित रखना चाहेगा जो सुरक्षा परिषद में एकमात्र गैर पश्चिमी स्‍थायी सदस्‍यता वाला देश है।

भारत के खिलाफ और देशों को ला सकता है चीन
एक अन्‍य विशेषज्ञ कांति बाजपेयी कहते हैं कि चीन अन्‍य शक्तिशाली देशों के बीच आम राय बनाने की कोशिश कर सकता है ताकि सुरक्षा परिषद में भारत को स्‍थायी सदस्‍य बनने से रोका जा सके। उन्‍होंने कहा कि कई ऐसे देश हैं जो भारत, जापान और जर्मनी का समर्थन नहीं करेंगे। चीन पाकिस्‍तान का भी इसमें इस्‍तेमाल कर रहा है। चीन के सरकारी मीडिया चाइना डेली के एक लेख में लिखा गया है कि मास्‍को के समर्थन के बावजूद, चीन की भारतीय सदस्यता के विरोध में बदलाव नहीं होगा।

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