नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने कभी सीबीआई को ‘पिंजड़े में बंद तोता’ कहा था। लगता है देश के सर्वोच्च न्यायालय की नजर में केंद्रीय जांच एजेंसी की यह छवि अभी बदली नहीं है। बल्कि एक और केंद्रीय एजेंसी ईडी के तौर-तरीकों पर भी उंगलियां उठ रही हैं। दिल्ली में घोटाले के लिए शराब नीति बदलने के आरोप की जांच कर रही दोनों एजेंसियों, सीबीआई और ईडी को सुप्रीम कोर्ट से कड़ी टिप्पणियां सुनने को मिल रही हैं। पहले दिल्ली के उपमुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) के बड़े मनीष सिसोदिया, फिर भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) की नेता के. कविता को इसी मामले में नियमित जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट के सवालों और टिप्पणियों से सीबीआई और ईडी पर इतना तो दबाव जरूर बन रहा होगा कि वो अपने काम-काज के तौर-तरीके बदलने पर विचार करे। सवाल है कि क्या ये दोनों केंद्रीय जांच एजेंसियां भविष्य के लिए सबक लेंगी?
सीबीआई-ईडी को फिर लगी लताड़
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के कथित शराब घोटाले की जांच में ईडी-सीबीआई के तरीकों पर मंगलवार को सवाल उठाया। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने मौखिक टिप्पणियों में ईडी-सीबीआई के तौर-तरीकों की धज्जियां उड़ा दीं। बेंच ने यहां तक कह दिया कि एजेंसियां गवाहों से लेकर आरोपपियों तक में ‘पिक एंड चूज’ की नीति अपनाती है जो भेदभावकारी है। उसने कहा कि के. कविता के मामले में ईडी-सीबीआई ने चुनिंदा गवाहों और सरकार के पाले में चले गए गवाहों के बयानों पर भरोसा किया क्योंकि उसे आरोप मढ़ने में आसानी हो।
अभियोजन को निष्पक्ष होना चाहिए। जिसने खुद का अपराध कबूल किया हो, उसे ही गवाह बना दिया गया। कल आपको कोई अच्छा लगे तो उसे चुन लीजिएगा और बुरा लगे तो छोड़ दीजिएगा? आप किसी आरोपी को चुन या छोड़ नहीं सकते। ये कैसी निष्पक्षता है? ऐसी स्थिति बहुत दुखद है। अगर उसकी कोई भूमिका है तो के. कविता जैसी ही है। तो साफ है कि आप एक को चुन रहे हैं और दूसरे को छोड़ रहे हैं।
सीबीआई-ईडी को सुप्रीम कोर्ट की फटकार
पिक एंड चूज वाली टिप्पणी चुभेगी तो जरूर
जस्टिस गवई ने कहा, ‘आप किसी आरोपी को पिक एंड चूज नहीं कर सकते। अगर आप अप्रूवर के बयानों पर गौर करें तो उसकी (शरद रेड्डी की) (कथित घोटाले में) भूमिका भी कविता जैसी ही है। अभियोजन पक्ष को निष्पक्ष होना चाहिए। आप किसी को पिक एंज चूज नहीं कर सकते। क्या यह निष्पक्षता है? कोई व्यक्ति जो गवाह होते हुए भी स्वयं को दोषी ठहराता है (लेकिन उसके खिलाफ मुकदमा नहीं होता है)? क्या यह बहुत निष्पक्ष और विवेक का सही उपयोग है?’ वहीं, जस्टिस विश्वनाथन ने किसी आरोपी पर कार्रवाई के लिए सह-आरोपी के बयानों पर भरोसा करने का मुद्दा उठाया।
जस्टिस विश्वनाथन ने कहा, ‘याचिकाकर्ता (के. कविता) पर आरोप के मद्देनजर उनके खिलाफ साक्ष्यों को देखें तो कानून की नजर में इसका क्या महत्व है? यह कितना बड़ा गुनाह हो सकता है? आप ऐसी दलीलें नहीं दे सकते। आपको अन्य साक्ष्यों को इकट्ठा करने के बाद उसकी गहन छानबीन करनी होगी। हम (सह-आरोपी अरुण पिल्लई के बयान के) वापस लिए जाने को छोड़ रहे हैं और सिर्फ कानूनी दृष्टिकोण से वापस न लिए गए बयान को ही मान रहे हैं।’
…और जस्टिस गवई ने एजेंसियों को चुप करा दिया
जस्टिस गवई ने तो इस बात पर भी ईडी और सीबीआई की खिंचाई की कि वो जमानत याचिका पर ऐसी दलीलें दे रही हैं मानो मेन ट्रायल हो रहा हो। उन्होंने सीबीआई और ईडी का पक्ष रख रहे वकीलों को हिदायत दी कि जमानत याचिका पर सुनवाई घंटों नहीं चल सकती, इसलिए वो कम शब्दों में अपनी बातें रख दें। दोनों एजेंसियों के वकीलों ने के. कविता को जमानत देने के खिलाफ दलीलें देते हुए जांच के दौरान मिले सबूतों का बार-बार जिक्र कर रहे थे। तब जस्टिस गवई ने आदेश पढ़ने से पहले इशारों में कहा कि अगर वो नहीं रुके तो सीबीआई और ईडी के व्यवहार पर भी टिप्पणी की जाएगी। उन्होंने चेतावनी भरे शब्दों में कहा, ‘(आप नहीं चाहते होंगे कि) एजेंसियों के व्यवहार पर कोई टिप्पणी की जाए।’
इससे पहले आप नेता मनीष सिसोदिया को जमानत देते हुए भी सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों एजेंसियों को जमकर सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ट्रायल लटकाकर आरोपी को असीमित वक्त तक जेल में नहीं रखा जा सकता है। कोर्ट ने कविता के मामले में भी कहा कि हिरासत की अवधि इतनी बड़ी नहीं हो कि वह अपने आप में सजा साबित हो जाए। सुप्रीम कोर्ट जांच से लेकर चार्जशीट फाइल करने तक में लेट-लतीफी के मामले पर दोनों एजेंसियों को काफी कुछ सुना चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अब सीबीआई और ईडी अपने काम-काज के तौर-तरीकों में बदलाव लाएगा?
