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सिर्फ ‘0.85%’ वोटों से तय हुई हरियाणा की कुर्सी! मार्जिन गेम में BJP ने कांग्रेस को ऐसे दी पटखनी

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नई दिल्ली,

हरियाणा विधानसभा चुनाव के शुरुआती रुझानों से लेकर अंतिम नतीजे आने तक, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और कांग्रेस दोनों ही दलों की उम्मीदें जिंदा रहीं. शुरुआती रुझानों में एक समय कांग्रेस बहुमत के आंकड़े के पार पहुंच गई. कांग्रेस कार्यालय पर जश्न भी शुरू हो गया लेकिन यह जश्न महज कुछ देर की खुशी साबित हुआ.

रुझान पलटे और बीजेपी ने रिकवरी की और तस्वीर जो बदली, कांग्रेस की उम्मीदें कांटे के मुकाबले में अंत तक जिंदा रहीं लेकिन पार्टी कभी सरकार बनाने की स्थिति में आती नहीं नजर आई. जीत का जश्न कांग्रेस कार्यालय से बीजेपी के कैंप में शिफ्ट हो गया. हरियाणा के मार्जिन गेम में कांग्रेस मामूली अंतर से पिछड़ गई. मामूली अंतर से सत्ता की तस्वीर तय हो गई और सूबे के पावर से पार्टी के 10 साल लंबे वनवास को और पांच साल का एक्सटेंशन मिल गया.

हरियाणा चुनाव का मार्जिन गेम
हरियाणा चुनाव में फाइट कितनी टाइट थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल पांच सीटें ही ऐसी रहीं जहां जीत-हार का अंतर 50 हजार से ज्यादा रहा. बादशाहपुर, फिरोजपुर झिरका, गढ़ी सांपला-किलोई, गुड़गांव और पानीपत ग्रामीण विधानसभा सीट पर जीत-हार का अंतर 50 हजार से अधिक रहा. सबसे बड़ी जीत का रिकॉर्ड फिरोजपुर झिरका से कांग्रेस के मामन खान के नाम रहा. मामन खान ने 98 हजार 441 वोट के अंतर से चुनावी बाजी जीती.

सूबे की 19 सीटें ऐसी रहीं जहां जीत-हार का अंतर पांच हजार से कम वोट का रहा जिनमें ती सीटों- डबवाली, लोहारू और उचाना कलां में तो एक हजार से भी कम अंतर से फैसला हुआ. क्लोज कॉन्टेस्ट वाली इन 19 सीटों में से सात सीटों पर कांग्रेस, 10 सीटों पर बीजेपी और दो सीटों पर चौटाला परिवार की इंडियन नेशनल लोक दल के उम्मीदवारों को जीत मिली.

इन सीटों पर पिछड़ने के बाद जीती कांग्रेस
हरियाणा की क्लोज फाइट वाली सीटों की बात करें तो पंचकुला सीट पर दोपहर तक कांग्रेस पीछे चल रही थी लेकिन अंत में नतीजे पार्टी के पक्ष में आए. कांग्रेस उम्मीदवार चंद्रमोहन बिश्नोई 1997 वोट से विजयी रहे. फतेहाबाद में ही दिन चढ़ने के साथ सीन बदला और लगातार पीछे चलते रहे बलवान सिंह दौलतपुरिया ने बाद में वापसी करते हुए 2252 वोट के अंतर से जीत हासिल की. आदमपुर सीट पर भी बीजेपी के भव्य बिश्नोई काफी देर तक बढ़त बनाए रहे लेकिन अंत में कांग्रेस उम्मीदवार चंदर प्रकाश को जीत मिली. कलानौर सीट पर भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला. बीजेपी उम्मीदवार रेणु डाबला ने बहुत देर तक बढ़त बनाए रखी लेकिन अचानक सीन बदला और कांग्रेस की शकुंतला खटिक को जो लीड मिली, वह निर्णायक साबित हुई.

0.85 फीसदी के मार्जिन से तय हुई सत्ता की तस्वीर
आंकड़ों की नजर से देखें तो 48 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही बीजेपी और 37 सीटों पर ठिठक गई विपक्षी कांग्रेस के बीच वोट शेयर के लिहाज से एक फीसदी से भी कम का अंतर रहा. बीजेपी को 39.94 फीसदी वोट मिले और कांग्रेस का वोट शेयर 39.09 फीसदी रहा. वोटों की बात करें तो बीजेपी को कुल मिलाकर 55 लाख 48 हजार 800 वोट मिले और कांग्रेस को 54 लाख 30 हजार 602.

आंकड़ों के आईने ये बता रहे हैं कि सत्ता पर काबिज होने जा रही पार्टी और विपक्ष में ही रह गए दल के बीच एक लाख 18 हजार 198 वोट का अंतर निर्णायक साबित हुआ. हरियाणा में सिर्फ 0.85 फीसदी वोट गैप ने सत्ता की तस्वीर तय कर दी.

AAP के साथ से बन सकता था कांग्रेस का गेम!
हरियाणा चुनाव में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार अधिकतर सीटों पर अपनी जमानत तक नहीं बचा सके लेकिन ओवरऑल नतीजे देखें तो यही नजर आता है कि अगर कांग्रेस ने उससे गठबंधन किया होता और वोट ट्रांसफर हुए होते तो तस्वीर अलग हो सकती थी. कांग्रेस और बीजेपी के बीच जितने वोट का अंतर रह गया, आम आदमी पार्टी को उससे कहीं अधिक दो लाख 48 हजार 455 वोट मिले हैं.

बीजेपी ने कांग्रेस को कैसे दी पटखनी
क्लोज कॉन्टेस्ट वाली सीटों पर कांग्रेस को पटखनी देने के लिए बीजेपी की रणनीति को चार पॉइंट में समझा जा सकता है.

1- माइक्रो प्लानिंगः बीजेपी ने क्लोज कॉन्टेस्ट वाली सीटें चिह्नित कर उनके लिए माइक्रो लेवल प्लानिंग की. ऐसी सीटों पर रणनीति के तहत मॉस रैलियों से अधिक जोर डोर-टू-डोर कैंपेन पर दिया.

2- उम्मीदवारों की भरमारः जहां पार्टी को उम्मीदवारों की भीड़ से जीत का रास्ता तैयार होता नजर आया, चर्चा यह भी है कि पार्टी ने अप्रत्यक्ष रूप से कई उम्मीदवार खड़े करा दिए. ऐसे उम्मीदवारों की वजह से एंटी बीजेपी वोट बंटे और कांग्रेस जीत से दूर हो गई.

3- दलितों पर फोकसः बीजेपी ने लोकसभा चुनाव नतीजों से सबक लेते हुए दलित वोटर्स को अपने पाले में लाने के लिए जातीय सम्मेलन भी किए. कुमारी सैलजा के खिलाफ हुई जातिगत टिप्पणी को भी मुद्दा बनाते हुए बीजेपी के नेता कांग्रेस पर हमलावर रहे और इसका फायदा उसे दलितों के लिए रिजर्व सीटों में तीन सीट के गेन के साथ मिला.

4. ओबीसी मैनेजमेंटः हरियाणा में सरकार की कमान ओबीसी चेहरे को सौंपा ही, नए सीएम सैनी की सरकार ने आते ही ओबीसी के लिए कई योजनाएं लॉन्च कीं. अपने संकल्प पत्र में भी पार्टी ने ओबीसी के लिए स्कॉलरशिप से बगैर गारंटी लोन तक, कई वादे किए और उन्हें जाटों के खिलाफ खुद से जोड़े रखा.

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