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Wednesday, March 18, 2026
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‘कोरोना में मुझे भी Dolo-650 खाने का दिया गया था सुझाव,’ SC के जज ने सुनाया किस्सा

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नई दिल्ली,

कोरोना काल में खासी चर्चा में आई पैरासिटामोल दवा ‘डोलो’ अब विवादों में फंसी है. सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में दावा किया गया है कि फार्मा कंपनी ने बुखार की दवा डोलो 650mg मरीजों को सुझाने के लिए देशभर में डॉक्टरों को 1000 करोड़ रुपये के मुफ्त उपहार बांटे हैं. इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से 7 दिन में जवाब मांगा है.

फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशन ऑफ इंडिया की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने सुप्रीम कोर्ट की बेंच के समक्ष बड़े दावे किए. उन्होंने बताया कि डोलो-650 के निर्माताओं ने 650mg फॉर्मूलेशन के लिए डॉक्टर्स पर 1000 करोड़ से ज्यादा खर्च किए हैं. वकील ने अपनी जानकारी के सोर्स के रूप में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) की एक रिपोर्ट का हवाला दिया.

सुनने में अच्छा नहीं लग रहा है: डीवाई चंद्रचूड़
इस मामले की सुनवाई SC के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने की. चंद्रचूड हाल ही में कोरोना संक्रमित हुए थे. उन्होंने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की- ‘जो आप कह रहे हैं, वो मुझे सुनने में अच्छा नहीं लग रहा. ये वही दवाई है, जिसका कोविड के दौरान मैंने खुद इस्तेमाल किया. मुझे भी इसका इस्तेमाल करने के लिए बोला गया था. ये वाकई गम्भीर मसला है.’

कोर्ट ने कहा- ये गंभीर मामला है
फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशन ऑफ इंडिया की जनहित याचिका ने देश में बेची जा रही दवाओं के फार्मूलेशन और कीमतों पर नियंत्रण के बारे में चिंता जताई है. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना की डबल बेंच ने पारिख की दलीलें सुनने के बाद कहा कि ये एक गंभीर मुद्दा है.

10 दिन बाद फिर सुनवाई
कोर्ट ने अब केंद्र सरकार से एक सप्ताह के भीतर जनहित याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है और 10 दिन के बाद मामले में फिर से सुनवाई की जाएगी.

उत्तरदायी बनाए जाने के निर्देश दिए जाएं
बेंच ने कहा कि ये एक गंभीर मुद्दा है. इसे प्रतिकूल मुकदमे के रूप में नहीं माना जाना चाहिए. याचिका में कहा गया है कि दवा कंपनियां डॉक्टरों को अपनी दवाएं लिखने के लिए मुफ्त उपहार देती हैं, इसके लिए उत्तरदायी बनाए जाने के लिए निर्देश देने की मांग की है.

महंगे गिफ्ट के चक्कर में ज्यादा कीमत की दवाएं लिखी जातीं
याचिका में कहा गया कि यूनिफॉर्म कोड ऑफ फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज (UCPMP) बनाए जाने की जरूरत है. कानून ना होने की वजह मरीजों को ब्रांडेड कंपनियों की बहुत ज्यादा कीमत वाली दवाई खरीदनी पड़ती हैं. क्योंकि डॉक्टर अक्सर महंगे गिफ्ट के चक्कर में मरीजों को वही दवाएं पर्चे पर लिखते हैं. याचिका में दावा किया गया है- ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के हस्ताक्षरकर्ता होने के बावजूद भारत में फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रथाओं में भ्रष्टाचार अनियंत्रित है.

UCPMP कोड बनाया जाए
सुनवाई के बाद पारिख ने कहा कि दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को उपहार दिए जाने के बदले में अनावश्यक दवाएं लिखवाई जाती हैं. इस समस्या से निपटने के लिए UCPMP कोड बनाया जाना चाहिए. ये खतरा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है.

दवा कंपनियां भी समान रूप से उत्तरदायी
वरिष्ठ वकील ने यह भी कहा कि डोलो मामले को एक उदाहरण के रूप में कोर्ट में रखा गया है. क्योंकि ये सबसे हालिया मुद्दा है. याचिकाकर्ता ने कहा है कि वर्तमान में सिर्फ डॉक्टर ही जिम्मेदार हैं, जबकि रिश्वत देने वाली दवा कंपनियां भी समान रूप से उत्तरदायी मानी जाएं.

डोलो सिर्फ उदाहरण…
पारिख ने कहा कि 500Mg के लिए दवा मूल्य निर्धारण प्राधिकरण द्वारा रेट तय किए जाते हैं. लेकिन जब आप इसे 650 मिलीग्राम तक बढ़ाते हैं तो ये रेट बेतहाशा बढ़ जाते हैं. इसलिए इसे इतना बढ़ावा दिया जा रहा है. ये मुफ्त का एक उदाहरण था. अधिक एंटीबायोटिक्स हैं बाजार में जिन्हें अलग-अलग तरीकों से प्रचारित किया जा रहा है, भले ही उनकी जरूरत न हो. दवा निर्माण को नियंत्रित करने के लिए एक वैधानिक ढांचा होना चाहिए.

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