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मुकदमा धीमा चल रहा तो आरोपी जमानत का हकदार, भले ही अपराध किसी भी तरह का हो : सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को जमकर फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि हर आरोपी का मूल अधिकार है कि उसके मामले का ट्रायल तेजी से चले, भले ही कथित अपराध की गंभीरता जैसी भी हो। अगर ट्रायल बहुत धीमा चल रहा है तो ऐसे मामलों में आरोपी जमानत का हकदार है। शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणी फेक करंसी मामले में गिरफ्तार एक शख्स को जमानत देते हुए की, जिसे मंबुई पुलिस ने 9 फरवरी 2020 को पकड़ा था।

जावेद गुलाम नबी शेख को मुंबई पुलिस ने छत्रपति शिवाजी महाराज इंटरनैशनल एयरपोर्ट के बाहर से गिरफ्तार किया था। उसके पास से कथित तौर पर 21 लाख रुपये मूल्य की फेक करंसी मिली थी। जांच के दौरान पता चला कि शेख को इन जाली नोटों को कुछ खास लोगों तक पहुंचाना था जिनकी छपाई कथित तौर पर पाकिस्तान में हुई थी। इसके बाद केस एनआईए को ट्रांसफर कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि एनआईए ने मामले में चार्जशीट तो दाखिल कर दिया है लेकिन ट्रायल कोर्ट अभी आरोपों को तय नहीं की पाई है। शेख की जमानत याचिका पर जवाब देने के लिए एनआईए के वकील की तरफ से समय देने का अनुरोध किया गया, जिसे कोर्ट ने ठुकरा दिया। बेंच ने कहा कि आरोपी पिछले 4 साल से जेल में है। स्पीडी ट्रायल उसका अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभी आरोपी के खिलाफ आरोप तय होने बाकी हैं लेकिन अभियोजन पक्ष की मंशा है कि करीब 80 गवाहों से जिरह की जाए।

जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और उज्जल भुयान की वकेशन बेंच ने इस बात पर हैरानी जचाई कि इतनी बड़ी तादाद में गवाहों से जिरह और ट्रायल कब पूरा होगा। बेंच ने आरोपी को जमानत देते हुए कहा, ‘जिस तरीके से अभियोजन एजेंसी और ट्रायल कोर्ट ने कार्यवाही की है, उससे आरोपी के स्पीडी ट्रायल के अधिकार का उल्लंघन होता है।’

बेंच ने जमानत याचिका खारिज करने के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया और शेख की रिहाई का आदेश दिया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने जमानत के साथ शर्त भी जोड़ी है। जावेद शेख को मुंबई शहर नहीं छोड़ना होगा और हफ्ते में एक बार उसे एनआईए दफ्तर में हाजिरी देनी होगी।

रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार 1979 में स्पीडी ट्रायल को आर्टिकल 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा मानते हुए मौलिक अधिकार बताया था। तब हुसैन आरा खातून मामले में अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार स्पीडी ट्रायल को जीवन के अधिकार के मौलिक अधिकार के साथ जोड़ा था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, ‘त्वरित सुनवाई क्रिमिनल जस्टिस का सार है लिहाजा मुकदमे में देरी अपने आप में न्याय से इनकार है। हालांकि, स्पीडी ट्रायल को विशेष रूप से मौलिक अधिकार के रूप में नहीं गिना जा सकता लेकिन यह अनुच्छेद 21 के व्यापक दायरे और सामग्री में जरूर निहित है।’

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