नई दिल्ली
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी चीन के भारतीय सीमा में अतिक्रमण का दावा करते हैं। मजे की बात है कि वो चीन को वैश्विक सद्भाव का संदेशवाहक भी बताते हैं। वैसे तो चीन की विस्तारवादी नीति से दुनिया अच्छी तरह वाकिफ है, लेकिन भारत के सबसे पुराने राजनीतिक दल के अनौपचारिक प्रमुख राहुल गांधी चीन को हार्मनी (सद्भाव) की भावना से ओत-प्रोत देश करार देते हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने राहुल गांधी की इस दावे पर हैरानी जताई। उन्होंने एक निजी न्यूज चैनल के कार्यक्रम में कहा कि चीन और सद्भाव, यह जमने वाली बात नहीं है। चीन मामलों के अमेरिकी एक्सपर्ट माइकल पिल्सबरी ने भी उनसे सहमति जताई और कहा कि राहुल गांधी को चीन पर और जानकारी जुटानी चाहिए। राहुल गांधी चीन की प्रगति के भी कायल हैं। लेकिन इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं होते कि भारत भी तेजी से कदम बढ़ा रहा है। बल्कि राहुल तो मौजूदा सरकार में भारत की पुरानी उपलब्धियों पर भी पानी फिरने का दावा करते हैं।
राहुल को सिर्फ चीन की प्रगति दिखती है?
यह सच है कि चीन की रफ्तार से अमेरिका भी हैरान है। दुनियाभर के बड़े-बड़े एक्सपर्ट्स भी इस बात पर सहमत हैं कि चीन ने चुपके-चुपके ऐसी-ऐसी रणनीतियां बनाईं और उन्हें जमीन पर उतारा जिनके बारे में दूसरे देशों ने सोचना भी मुनासिब नहीं समझा। भारत की ही बात कर लें तो यहां की सरकारें सीमाई इलाकों में इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के प्रति दशकों तक उदासीन रहीं। उन्होंने कभी सोचा ही नहीं कि एलएसी और एलओसी के आसपास इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण से भविष्य में क्रमशः चीन और पाकिस्तान पर हमें किस तरह की सैन्य बढ़त हासिल हो सकती है। अच्छी बात है कि केंद्र की मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार में बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर को शीर्ष प्राथमिकता देते हुए बड़ी तेजी से काम हो रहा है। आर्मी चीफ जनरल मनोज पांडे ने भी इस बात पर संतोष जताते हुए कहा है कि भारत अब इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में चीन से भी दो कदम आगे निकलने को आतुर दिख रहा है। लेकिन राहुल गांधी कांग्रेस सरकारों की चीन-नीति पर चुप्पी साध लेते हैं और उल्टा दावा करते हैं कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर को चीन की समझ ही नहीं है।
सेना प्रमुख की तो सुन लीजिए, राहुल जी!
जनरल मनोज पांडे का कहना है कि भारत ने चीन की चुनौती को स्वीकार कर लिया है और उससे हर मोर्चे पर निपटने को पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि भारत अब भी चीन के साथ मुद्दों के बातचीत के जरिए सुलझाने को तवज्जो देता है, लेकिन अगर चीन ने कोई चालबाजी की तो उसे मुंहतोड़ जवाब देने में कोई हिचक नहीं होगी। दो साल पहले घुसपैठ की कोशिशों को रोकने की बात हो या फिर गलवान और तवांग में चीनी सैनिकों की हेकड़ी ढीली करने की, दुनिया ने नए भारत का मिजाज भांप लिया है। आर्मी चीफ ने कहा, ‘हमारे पास किसी भी इमरजेंसी स्थिति से निपटने के लिए नई टेक्नोलॉजी और एडवांस हथियारों के साथ पर्याप्त भंडार है। हम टेक्नोलॉजी और सैन्य शक्ति में तो मजबूत हैं ही, बुनियादी ढांचों के विकास पर भी उतना ही फोकस कर रहे हैं। एलएसी के आसपास सड़कें, हेलीपैड जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विकास किया जा रहा है।’
चीन और भारत में अंतर तो समझना होगा
अमेरिकी एक्सपर्ट माइकल पिल्सबरी ने गुरुवार के कार्यक्रम में कहा था कि चीन कुछ मायनों में अमेरिका को भी पीछे छोड़ चुका है, भारत की बात ही क्या है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि भारत ने असल समस्याओं को पहचान लिया है और वो इस तरफ गंभीरता से काम भी कर रहा है। चूंकि चीन की चुनौतियों की तरफ भारत की नजर देर से गई है, इस कारण अभी उसे बहुत काम करना है। अगर चीन से पार पाना है तो भारत को रॉकेट की रफ्तार से रणनीतिक महत्व के सारे काम निपटाने होंगे। जनरल पांडे कहते हैं कि भारत इसी तरफ अग्रसर है। भारत का चीन से सिर्फ एक ही मायने में मुकाबला नहीं हो सकता और वो है पर्देदारी। भारत में मजबूत लोकतंत्र है, फ्री मीडिया है। यहां कुछ भी छिपाया या दबाया नहीं जा सकता, लेकिन चीन की एकदलीय शासन व्यवस्था में सबकुछ चुपके-चुपके अंजाम दिया जाता है।
सीमा पर चीन की चालाकी तो नहीं छिप सकती
दरअसल, पर्देदारी चीन की एक विशेष रणनीति है। वह क्या सोचता है, क्या करता है और क्या करने वाला है, इससे दुनिया को बेखबर रखने के लिए वह विशेष प्रयास करता है। लेकिन कुछ चीजें हैं जिनपर पर्दा नहीं डाला जा सकता। इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण के काम भी दुनिया की नजरों से छिपाए नहीं जा सकते हैं। इसलिए भारतीय सीमा पर उसकी मंशा साफ झलक रही है। भारत के सेना प्रमुख ने कहा कि भले ही चीन सीमा पर अभी शांति बरत रहा हो, लेकिन यहां कब तक स्थिरता रहेगी, इसका कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि चीन बहुत तेजी से इन्फ्रास्ट्रक्चर बना रहा है। स्वाभाविक है कि इसके पीछे चीन की सोची-समझी रणनीति है जो दो साल पहले उसके अतिक्रमण के प्रयासों के बाद छिपी भी नहीं रह गई। पहले गलवान घाटी और फिर तवांग में भारत और चीन के सैनिकों के बीच झड़प भी हो चुकी है। गलवान में तो दोनों तरफ के दर्जनों सैनिकों की जान चली गई।
