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नेपाल के नोट पर विवादित नक्शा… जानें क्या है भारत संग सीमा विवाद, 208 साल पहले हुई संधि फिर क्यों नहीं सुलझा विवाद?

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काठमांडू:

नेपाल की ओर से हाल ही में जारी हाल ही में जारी 100 रुपए के नोट को लेकर विवाद है। इस नोट पर नेपाल ने अपना जो नक्शा छापा है, उसमें कई ऐसे क्षेत्र भी शामिल हैं, जिनको भारत अपना कहता है। प्रधान मंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड की सरकार ने 3 मई को नेपाल ने 100 रुपए के नए नोट पर विवादास्पद नक्शे के इस्तेमाल का फैसला लिया। नेपाल ने कहा कि कैबिनेट ने 25 अप्रैल और 2 मई को चर्चा के बाद नोट के नए डिजाइन को मंजूरी दे दी है और पुराने नोटों के स्थान पर नए नोट जारी किए गए हैं। नेपाल ने करीब चार साल पहले, 2020 में इस नक्शे को जारी किया था और ये विवाद की वजह बना था। एक बार फिर ऐसे समय पर नेपाल ने ये विवाद फिर खड़ा कर दिया है, जब भारत में लोकसभा चुनाव हो रहे हैं।

इस फैसले के बाद कथित तौर पर नेपाल के राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल के आर्थिक सलाहकार चिरंजीवी ने इस कदम की आलोचना करते हुए इस्तीफा दे दिया। भारत की ओर से भी इस प्रतिक्रिया आई। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने फैसले को एकतरफा बताते हुए कहा कि इस मामले पर भारत की स्थिति साफ है और ऐसे निर्णय जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं ला सकते हैं। एबीपी की रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल के विवादास्पद नक्शे को पूर्व प्रधान मंत्री केपीएस ओली की सरकार के समय अपनाया गया था। ये निश्चित ही भारत के साथ नेपाल के संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

मौजूदा विवाद कैसे शुरू हुआ
नेपाल और भारत 1850 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। भारत के सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों से नेपाल की सीमा छूती है। दोनों देशों के बीच कुछ जगहों पर बॉर्डर विवाद है। हालिया विवाद की शुरुआत 2020 में तब हुई जब भारत विरोधी अभियान चलाकर सत्ता में आए नेपाल के पूर्व पीएम ओली ने देश का नक्शा बदल दिया। भारत को झटका देते हुए जून 2020 में नेपाल ने भारत के साथ विवादित क्षेत्रों पर अपना दावा किया। नेपाल ने लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी के अपनी सीमा में होने का दावा किया, जिसे भारत अपना कहता है। नेपाल की ओर ये ये तब किया गया, जब भारत-चीन सीमा पर लिपुलेख दर्रे को कैलाश-मानसरोवर मार्ग से जोड़ने वाली एक नई सड़क खोलने का फैसला भारत ने लिया था।

इससे पहले दिसंबर 2019 में भारत की ओर से भी एक नक्शा जारी किया गया था, इसमें कालापानी को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के हिस्सा दिखाया गया। नेपाल की ओर से तब आपत्ति की गई थी, जिस पर भारत ने मतभेदों को सुलझाने के लिए एक विदेश सचिव स्तर की वार्ता तंत्र का गठन करने की बात कही थी। इसके बाद कोविड महामारी के चलते बातचीत शुरू नहीं हो सकी और फिर नेपाल ने विवादित नक्शा जारी कर दिया।

लंबे समय से क्यों जारी है ये सीमा विवाद?
भारत और नेपाल के बीच बॉर्डर का फैसला 1816 की सुगौली संधि के तहत हुआ था। नेपाल और उस समय भारत पर शासन कर रही ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच ये संधि हुई थी। इस संधि में काली नदी को सीमा के रूप में निर्धारित किया गया है। यह समझौता काली नदी के उद्गमदी और उसकी धाराएं उत्तराखंड के पिथौरागढ जिले से होकर गुजरती हैं और सभी धाराओं का संगम कालापानी और लिम्पियाधुरा में होता है।

आजादी के बाद भारत ने ब्रिटिश शासन और नेपाल के बीच बनी सहमति को स्वीकार कर लिया लेकिन कई मुद्दों पर विवाद लगातार बना रहा। नेपाल ने इस बात का भी विरोध किया है कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से भारतीय सेना ने इस क्षेत्र में शिविर चला रखे हैं। विवाद के केंद्र में स्थित लिपुलेख दर्रा 5,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह ऊपरी हिमालय में नेपाल और चीन के साथ भारत की सीमा पर भूमि की एक पट्टी है।

 

 

 

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