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Wednesday, April 22, 2026
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महाराष्ट्र : पुलिस ने की चूक या कोई साजिश, 39 छात्राओं को यौन शोषण के आरोपी को मिली रिहाई, जानें कैसे

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पुणे

52 साल के एक टीचर को पुणे पुलिस ने पिछले साल दिसंबर में गिरफ्तार किया गया था। उन पर 39 स्कूली लड़कियों के यौन उत्पीड़न का आरोप था। सोमवार को एक विशेष अदालत ने टीचर की गिरफ्तारी को गैरकानूनी करार देते हुए उन्हें येरवडा केंद्रीय कारागार से रिहा कर दिया। अदालत ने कहा कि पुणे ग्रामीण पुलिस ने गिरफ्तारी की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया।

कोर्ट ने इस बेस पर की रिहाई
अदालत ने अपने चार पन्नों के आदेश में कहा, ‘आवेदक-शिक्षक को 24 दिसंबर, 2024 को गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी फॉर्म में उल्लेख है कि उनके रिश्तेदार को सूचना दी गई थी। लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे पता चले कि उन्हें गिरफ्तारी के कारणों का लिखित में सूचना दी गई थी। पुलिस ने अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं किया है। नज़रबंदी गैरकानूनी है और कानून के स्पष्ट आदेश का उल्लंघन करती है। इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती और आवेदक को तुरंत रिहा किया जाना चाहिए।’

जेल से बाहर, पर चलेगा केस
स्पेशल जज (POCSO एक्ट) कविता शिर्भाते ने शिक्षक को रिहाई के आठ दिनों के भीतर 25,000 रुपये का निजी/ज़मानत बांड जमा करने का निर्देश दिया। रक्षा वकील विपुल दुशिंग ने बताया, ‘अदालत के आदेश के बाद हमारे मुवक्किल को जेल से रिहा कर दिया गया, लेकिन पुलिस के चार्जशीट दाखिल करने के बाद उन्हें मुकदमे का सामना करना पड़ेगा।’

संविधान के इस अनुच्छेद का दिया हवाला
दुशिंग ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22 (1) का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी देना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक मौलिक अधिकार है। उन्होंने कहा, ‘दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 50 भी यह प्रावधान करती है कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार और जमानत के अधिकार के बारे में सूचित किया जाना चाहिए।’

वकील ने दलील दी कि बिना वारंट के किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने वाला प्रत्येक पुलिस अधिकारी उसे उस अपराध के बारे में पूरी जानकारी देगा जिसके लिए उसे गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का हवाला दिया जिनमें कहा गया है कि अगर गिरफ्तारी से संबंधित जानकारी नहीं दी जाती है, तो पुलिस की कार्रवाई असंवैधानिक, गैरकानूनी और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो जाती है।

पुलिस बॉम्बे हाई कोर्ट में करेगी अपील
पुणे ग्रामीण के पुलिस अधीक्षक पंकज देशमुख ने बताया, ‘हमने राज्य अभियोजन पक्ष को विशेष अदालत के आदेश के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर करने के लिए कहा है क्योंकि हमें लगता है कि हमने शिक्षक को गिरफ्तार करने से पहले कानून के अनिवार्य प्रावधानों का पालन किया है।’

पुणे पुलिस का क्या दावा
रांजनगांव MIDC के प्रभारी पुलिस निरीक्षक महादेव वाघमोडे ने कहा कि हमारे जांच अधिकारी ने शिक्षक को एक लिखित नोटिस दिया था और उन्हें गिरफ्तारी के कारणों से अवगत कराया था। जब उन्हें पहली बार हिरासत में भेजने के लिए पेश किया गया था, तब अदालत ने उनकी गिरफ्तारी को उचित भी ठहराया था।

विशेष लोक अभियोजक नितिन कोंगहे ने CrPC की धारा 251 का हवाला दिया और तर्क दिया कि पुलिस ने शिक्षक की गिरफ्तारी की सूचना उनके रिश्तेदार को दे दी थी और लिखित में विवरण देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। यानी, पुलिस का कहना है कि उन्होंने शिक्षक के रिश्तेदार को गिरफ्तारी की जानकारी दे दी थी, इसलिए लिखित में बताने की ज़रूरत नहीं थी।

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