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Wednesday, March 4, 2026
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नीतीश सरकार अब राज्य कर्मियों को सिखाएगी उर्दू, बिहार चुनाव से पहले क्यों लिया ये फैसला?

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पटना

बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव होना है। चुनाव से पहले बिहार की नीतीश सरकार ने उर्दू भाषा को बढ़ावा देने के लिए एक नई पहल की घोषणा की है। इस योजना के तहत सरकारी कर्मचारियों और आम नागरिकों को उर्दू भाषा सिखाने की व्यवस्था की गई है। इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में साहित्य, वकालत, शिक्षा, समाज सेवा और पत्रकारिता से जुड़े लोग भी भाग ले सकते हैं। नीतीश सरकार की ओर से चलाई जा रही यह उर्दू ट्रेनिंग 70 दिनों तक चलेगी, जिसमें हर दिन दो घंटे की कक्षाएं होंगी। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 8 अप्रैल से शुरू होने वाला है। हर सप्ताह सोमवार से गुरुवार तक दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक कक्षाएं संचालित की जाएंगी, जबकि छुट्टियों के दिन क्लास नहीं होगी।

उर्दू भाषा को लेकर सरकार का सकारात्मक दृष्टिकोण
बिहार में उर्दू भाषा को लेकर समय-समय पर राजनीतिक बहस होती रही है। हालांकि, सरकार का मानना है कि उर्दू और हिंदी एक-दूसरे से घुल-मिल चुकी हैं और हमारी रोजमर्रा की भाषा का अभिन्न हिस्सा बन गई हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने यह निर्णय लिया है, जिससे भाषा के महत्व को बढ़ावा दिया जा सके।

सरकारी कर्मचारियों और आम नागरिकों के लिए सुनहरा अवसर
कैबिनेट सचिवालय ने सरकारी कर्मचारियों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी इस ट्रेनिंग में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया है। खासतौर पर बैंक कर्मचारी, अधिकारी और वे लोग जो उर्दू भाषा नहीं जानते, इस कार्यक्रम के तहत उर्दू सीख सकते हैं। सरकार इस पूरी ट्रेनिंग का प्रबंधन खुद कर रही है।

ऑनलाइन और ऑफलाइन आवेदन की सुविधा
इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल होने के इच्छुक सरकारी कर्मचारी ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं या फिर उर्दू निदेशालय, हिंदी भवन के पते पर आवेदन भेज सकते हैं। वहीं, गैर-सरकारी लोग मेल या डाक के जरिए अपना आवेदन जमा कर सकते हैं।

सांस्कृतिक समन्वय और रोजगार के नए अवसर
बिहार सरकार द्वारा शुरू की गई इस पहल का मुख्य उद्देश्य उर्दू भाषा को बढ़ावा देना है। उर्दू भाषा सीखने से सरकारी दफ्तरों में कामकाज को समझना आसान हो जाएगा, क्योंकि कई सरकारी दस्तावेज अब भी उर्दू में मौजूद हैं। इससे न केवल सरकारी प्रक्रियाओं को समझने में आसानी होगी, बल्कि लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी खुलेंगे। बिहार सरकार की यह पहल भाषा, संस्कृति और समाज के बीच एक सेतु का कार्य करेगी और इससे आपसी समझ और भाईचारे को बढ़ावा मिलेगा।

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