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हाईकोर्ट के आदेश में तमाम खामियां… राज्य का सर्कुलर संविधान का उल्लंघन, हिजाब मामले में सुप्रीम कोर्ट में दलील

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नई दिल्ली

हिजाब बैन के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान कर्नाटक सरकार की ओर से दलील दी गई है कि सर्कुलर के तहत सिर्फ यूनिफॉर्म पहनने की इजाजत दी गई है। राज्य सरकार का सर्कुलर बिल्कुल रीलीजन न्यूट्रल (धार्मिक समानता) का है। दूसरी तरफ, याची के वकील दुष्यंत दवे ने दलील दी कि हाई कोर्ट के फैसले में कई खामियां हैं जजमेंट टिकने वाला नहीं है। राज्य सरकार का सर्कुलर गैर संवैधानिक और अवैध है। साथ ही अनुच्छेद-14, 19, 21 और 25 का उल्लंघन करता है। हिजाब मुस्लिम महिलाओं के गरिमा से जुड़ा मामला है। संविधान का अनुच्छेद-21 गरिमा के साथ जीवन के अधिकार की बात करता है। हिजाब पहनने से किसी और की धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचता है।

सरकार का फैसला सेक्युलर नेचर का
तुषार मेहता ने कहा कि 2021 तक कोई लड़की हिजाब नहीं पहन रही थी लेकिन एकाएक उन्होंने पहनना शुरू कर दिया। दूसरे कम्युनिटी के लोगों ने भगवा शॉल पहन लिया। गेरुआ शॉल या चादर को भी बैन किया गया है। सरकार संवैधानिक दायित्व का पालन कर रही है। सरकार का फैसला सेक्युलर फैसला है। हम हिजाब और भगवा दोनों को रेफर कर रहे हैं और दोनों को रोक रहे हैं। सर्कुलर यही कहता है, ऐसा नहीं है कि एक समुदाय विशेष को कुछ पहनने से मना किया गया है। सभी स्टूडेंट्स को यूनिफॉर्म पहनना है। सर्कुलर रीलिजियस न्यूट्रल है।

‘हम हिजाब और भगवा दोनों की बात कर रहे हैं’
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राज्य सरकार की ओर से दलील दी कि स्कूल में दाखिले के वक्त तमाम नियम तय हैं और रूल्स का पालन स्टूडेंट्स को करना होता है। 2022 में इस बारे में सोशल मीडिया पर आंदोलन शुरू किया गया था। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया द्वारा यह सब कराया गया और यह साजिश का हिस्सा है और बच्चों ने उसी पर एक्ट किया है। पहले स्टूडेंट्स इस बारे में सोच भी नहीं रहे थे लेकिन एकाएक हिजाब पहनने लगे और आंदोलन शुरू हुआ। राज्य सरकार का फैसला बिल्कुल सेक्युलर नेचर का है। इस दौरान जस्टिस हेमंत गुप्ता ने सवाल किया कि लेकिन आपने तो हिजाब पहनने पर रोक लगाई है एक रिट याचिका में ऐसा ही है कि आपने हिजाब को एकाएक रोका है। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि हम गेरुआ और हिजाब दोनों की बात कर रहे हैं रोक किसी कम्युनिटी विशेष को नहीं है बल्कि सर्कुलर में है कि सिर्फ यूनिफर्म पहनना है। यूनिफॉर्म जहां नहीं है वहां देश की एकता व समानता के भाव वाले ड्रेस पहनने हैं जो कानून के दायरे में है।

राज्य ने किसी धर्म विशेष को नहीं छुआ है
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस धुलिया ने सवाल किया कि आप कह रहे हैं कि आप सिर्फ ड्रेस कोड की बात कर रहे हैं। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि बिल्कुल वह सिर्फ ड्रेस की बात कर रहे हैं हमने किसी धर्म को नहीं छुआ है। हिजाब की बात नहीं है बल्कि हम कह रहे हैं कि धार्मिक पहचान वाले कपड़े वहां भी न पहने जाएं जहां स्कूल में यूनिफर्म नहीं है। स्टूडेंट्स ऐसे समानता और एकता वाले ड्रेस पहनें जिनमें धार्मिक पहचान न हो। सिख से हम तुलना नहीं कर सकते हैं क्योंकि उनका कड़ा और पगड़ी आदि उनकी पहचान है। साथ ही सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि राज्य सेक्युलर एक्टविटी को रेग्युलेट करता है। यूनिफॉर्म का उद्देश्य एकता और समानता कायम करना है। इस्लामिक देशों में हिजाब के खिलाफ महिलाओं का प्रदर्शन है जज के पूछे जाने पर कहा कि ईरान ऐसा देश है जहां इसके खिलाफ प्रदर्शन हो रहा है और इसके जाहिर है कि हिजाब इस्लाम का जरूरी प्रैक्टिस नहीं है।

अनुशासन सबके लिए समान है
तुषार मेहता ने कहा कि अनुशासन सबके लिए समान है यह अलग अलग नहीं हो सकता है इससे किसी को हानि नहीं है। जब जस्टिस धुलिया ने कहा कि बच्चे जाड़े में मफलर भी पहनते हैं उस पर क्या कहेंगे। तब सॉलिसिटर ने कहा कि वह धार्मिक पहचान का नहीं होता है। ऐसा कोई ड्रेस नहीं होना चाहिए जो धार्मिक पहचान का हो अगर शिक्षा सेक्युलर संस्थान में है। मफलर चश्मे से धार्मिक पहचान नहीं होती है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस धुलिया ने कहा कि याचिकाकर्ता की दलील है कि कुरान में हिजाब का जिक्र है और यह फर्ज बनाता है। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि कुरान में जिक्र जरूरी प्रैक्टिस नहीं बनाता है बल्कि इजाजत देता है। धर्म ग्रंथ सिर्फ किसी व्यवहार का आधार नहीं हो सकता है बल्कि कई बार कानून का उल्लंघन भी हो जाता है। साथ ही कहा कि इस्लाम में पांच प्रैक्टिस की बात है जिनमें हिजाब नहीं है।

धार्मिक भावनाओं को सीमित नहीं किया जा सकता
इससे पहले याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने दलील दी कि किसी भी धार्मिक भावनाओं को सीमित नहीं किया जा सकता है। उसे हर्ट नहीं किया जा सकता है। अनुच्छेद-25 का जिक्र करते हुए कहा कि वह संविधान में विश्वास की बात करता है और यह आर्टिकल सहिष्णुता की भी बात करता है। यूनिफर्म बहुतायत लोगों पर एक बोझ की तरह है जो थोपना जैसा है और लोगों के पास इसे खरीदने के लिए पैसे भी नहीं होते हैं।

यूनिफॉर्म से विषमताएं दूर होती है
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस गुप्ता ने इस दौरान कहा कि यूनिफर्म को समानता लाता है और विषमताएं दूर करता है इससे अमीरी गरीबी नहीं दिखती है। जब दवे ने दलील दी कि संविधान सभा में बहस के दौरान तमाम अनुच्छेद पर बहस हुई। इस पर जस्टिस गुप्ता ने कहा कि तमाम व्यक्तिगत ओपिनियन आए हैं लेकिन जब संविधान बना तो ऐसे ओपिनियन क्या अहम रह गए? इस पर दवे ने कहा कि किसी अनुच्छेद बनने की प्रक्रिया को समझने के लिए उसके संदर्भ को देखना जरूरी है। एडवोकेट दवे ने कहा कि अनुच्छेद-25 को देखना जरूरी है। सबरीमाला केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं को प्रवेश का हक है। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि लेकिन वह जजमेंट तो अनुच्छेद-15 पर आधारित है तब एडवोकेट दवे ने कहा कि वह फैसला अनुच्छेद-25 को भी मानता है। हाई कोर्ट कैसे कह सकता है कि हिजाब पहनने से दूसरे के अधिकारों का उल्लंघन होता है। दवे ने अनुच्छेद-21 का भी जिक्र किया और कहा कि उसमें जीवन के साथ गरिमा का अधिकार भी शामिल है और यह हिजाब भी गरिमा से जुड़ा हुआ है। जैसे हिंदू महिला सिर पर पल्लू रखती हैं उसी तरह से हिजाब है।

…यह किसी रेजिमेंट की तैयारी नहीं
दवे ने मेनका गांधी संबंधित वाद में सुप्रीम कोर्ट ने जीवन के अधिकार में गरिमा का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह सर्कुलर एक्ट और संविधान के बाहर जाकर जारी हुआ है।11 वीं और 12 वीं के बच्चे रेजिमेंट के पार्ट नहीं है लिबरल माहौल चाहिए। यूनिफॉर्म पहनकर उसी कलर का हिजाब पहना जा सकता है। दवे ने दलील दी कि हाई कोर्ट के फैसले में कई खामियां हैं। जजमेंट टिकने वाला नहीं है। राज्य सरकार का सर्कुलर गैर संवैधानकि और अवैध है साथ ही अनुच्छेद-14, 19, 21 और 25 का उल्लंघन करता है।

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