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Wednesday, March 4, 2026
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RSS नेता भैयाजी जोशी के बयान पर महाराष्ट्र में राजनीतिक बवाल, क्या मुंबई में बढ़ रही यूपी-बिहार के लोगों की संख्या?

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नई दिल्ली

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ नेता सुरेश भैयाजी जोशी के बयान को लेकर मुंबई और महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा सियासी तूफान खड़ा हो गया है। भैयाजी जोशी के बयान के खिलाफ खिलाफ महाराष्ट्र में विपक्षी महा विकास अघाड़ी में शामिल राजनीतिक दल एकजुट हो गए हैं और उन्होंने आरएसएस नेता के बयान की जमकर आलोचना की है।

मुंबई की जनसंख्या में पिछले कुछ सालों में किस तरह के बदलाव हुए हैं, मराठी बोलने वाले लोगों की संख्या क्या कम हुई है और क्या हिंदी और दूसरी भाषा बोलने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है, इस तरह के तमाम सवाल एक बार फिर भैयाजी जोशी के इस ताजा बयान के बाद खड़े हुए हैं।

क्या कहा भैयाजी जोशी ने?
भैयाजी जोशी ने बयान दिया था कि मुंबई की एक भाषा नहीं है और मुंबई आने वाले लोगों को मराठी सीखने की जरूरत नहीं है। यह बयान उन्होंने बुधवार को विले पार्ले में एक कार्यक्रम में दिया। भैयाजी जोशी ने कहा था, ‘मुंबई में कोई एक भाषा नहीं है, मुंबई में कई भाषाएं हैं। अलग-अलग इलाकों की अलग-अलग भाषाएं हैं। उदाहरण के लिए, घाटकोपर की भाषा गुजराती है। गिरगांव में आपको हिंदी बोलने वाले कम लोग मिलेंगे। वहां आपको मराठी बोलने वाले लोग मिलेंगे। मुंबई आने वाले लोगों को मराठी सीखने की कोई ज़रूरत नहीं है।’ यहां जिक्र करना जरूरी होगा कि मुंबई और महाराष्ट्र में मराठी भाषा सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक है।

एकजुट विपक्ष ने मांगा सरकार से जवाब
भैयाजी जोशी के बयान को लेकर उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना के सांसद संजय राउत और महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता अंबादास दानवे ने बीजेपी के नेतृत्व वाली महायुति की सरकार से पूछा कि क्या वे आरएसएस नेता के बयान का समर्थन करती है? शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के विधायक रोहित पवार ने साफ तौर पर कहा कि मुंबई की भाषा मराठी है। उन्होंने मांग की कि महायुति की सरकार को आरएसएस नेता के बयान पर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। इसी तरह शिवसेना (उद्धव गुट) विधायक भास्कर जाधव ने गुरुवार को विधानसभा में यह मुद्दा उठाया और सरकार से स्पष्टीकरण देने को कहा।

इस टेबल से समझिए कि मुंबई में किस भाषा को बोलने वाले कितने लोग रहते हैं और इनकी संख्या में कितना बदलाव हुआ है।

भाषा 2001 की जनगणना 2011 की जनगणना बदलाव (प्रतिशत में)
गुजराती 14,34,569 14,28,091 0.45% की गिरावट
हिन्दी 25,82,201 35,98,542 39.35% बढ़ोतरी
मराठी 45,24,559 44,04,928 2.64% की गिरावट
उर्दू 15,87,893 14,59,412 8.09% की गिरावट

क्या कहा देवेंद्र फडणवीस ने?
विपक्ष के जोरदार हमलों के बीच मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बयान देने के लिए सामने आए। उन्होंने कहा कि हालांकि उन्होंने अभी तक भैयाजी जोशी का बयान नहीं सुना है लेकिन सरकार का रुख यह है कि मुंबई और महाराष्ट्र में मराठी जरूरी है। फडणवीस ने कहा, ‘हम दूसरी भाषाओं का सम्मान करते हैं लेकिन मराठी को लेकर कोई समझौता नहीं करेंगे क्योंकि महाराष्ट्र में रहने वाले हर शख्स को मराठी बोलनी और सीखनी चाहिए।’

मुंबई की राजनीति में मराठी भाषा की अहम भूमिका रही है और इसे इस महानगर की अलग पहचान का प्रतीक माना जाता है। जोशी के बयान को लेकर विपक्षी दलों के विरोध के बीच मुंबई और महाराष्ट्र में मराठी भाषा की अहमियत को लेकर बहस तेज हो गई है।

जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, मुंबई में मराठी को मातृभाषा के रूप में पहचानने वाले लोगों की संख्या 2001 में 45.23 लाख थी, जो 2011 में घटकर 44.04 लाख रह गई। इस तरह इसमें 2.64% की गिरावट आई है और इससे मराठी भाषा के संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ रही है। जिस तरह मुंबई में भाषा को लेकर विविधता बढ़ रही है, उससे इस शहर की सांस्कृतिक पहचान को लेकर भी एक नई बहस खड़ी हो गई है। मुंबई की कुल जनसंख्या 2001 में 1.19 करोड़ थी, जो 2011 में बढ़कर 1.24 करोड़ हो गई।

मुंबई पर हो रहा बदलाव का असर
मुंबई में बड़ी संख्या में देश भर के तमाम राज्यों से विशेषकर उत्तर भारत के राज्यों से लोग कामकाज करने के लिए आते हैं। पिछले 30-40 सालों में मुंबई का जबरदस्त पैमाने पर विस्तार हुआ है और यहां अलग-अलग भाषाओं को बोलने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ी है और इस वजह से और मुंबई में हो रहे बदलावों का असर इस महानगर की पहचान पर भी पड़ा है। इस वजह से मुंबई की पहचान धीरे-धीरे हिंदी भाषी शहर के रूप में हो रही है और इससे पता चलता है कि यहां का सांस्कृतिक और सामाजिक ताना-बाना बदल रहा है।

हिंदी-भाषी लोगों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी
जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है कि मुंबई में किस तरह के भाषाई बदलाव हो रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 2001 में मुंबई में हिंदी को मातृभाषा मानने वाले लोगों की संख्या 25.88 लाख थी जो 2011 में 40% बढ़कर 35.98 लाख हो गई। ऐसा मुंबई के आसपास के इलाकों में भी देखा गया है, जहां ठाणे और रायगढ़ जिलों में हिंदी-भाषी लोगों की संख्या में 80% की बढ़ोतरी हुई है।

जनगणना के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि गुजराती बोलने वालों की संख्या 2001 में 14.34 लाख थी, जो 2011 में घटकर 14.28 लाख रह गई। वहीं, उर्दू बोलने वालों की संख्या में लगभग 8% की गिरावट आई है। 2001 में उर्दू बोलने वालों की संख्या 16.87 लाख थी जो 2011 में घटकर 14.59 लाख रह गई।

कैसे विकसित हुआ मुंबई, क्या है प्रवासियों की भूमिका?
मुंबई मूल रूप से एक पोर्ट सिटी यानी कि बंदरगाह शहर था। साल 1900 के दशक में मुंबई में कपड़ा उद्योग तेजी से बढ़ा। 1921 तक इस शहर की आबादी में लगभग 84% हिस्सा प्रवासियों का था। इन प्रवासियों में से भी अधिकांश लोग पूर्व बॉम्बे प्रेसिडेंसी के इलाके जैसे- कोंकण, पश्चिमी महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा से आए थे। मुंबई को एक व्यावसायिक और औद्योगिक केंद्र बनाने में इन प्रवासियों की अहम भूमिका है। हालांकि पिछले 40 सालों में मुंबई में औद्योगीकरण की रफ्तार कम हुई है और कपड़ा मिले बंद हो गई हैं।

जैसे-जैसे मुंबई शहर औद्योगिक केंद्र से सेवा-आधारित इकनॉमी की ओर बढ़ा, यहां प्रवास का पैटर्न भी बदल गया। शहर में अब दूसरे राज्यों से आने वाले प्रवासियों की संख्या बढ़ने लगी, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार से क्योंकि सेवा क्षेत्र में सस्ते श्रम की मांग बढ़ रही थी।

यूपी, बिहार से आने वाले प्रवासियों की संख्या बढ़ी
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेज के Department of Migration and Urban Studies से जुड़े राम बी. भगत के शोध पत्र “Population Change and Migration in Mumbai Metropolitan Region: Implications for Politics and Governance” के अनुसार, मुंबई में महाराष्ट्र से आने वाले प्रवासियों की संख्या 1961 में 41.6% थी, जो 2001 में घटकर 37.4% रह गई।

शोध पत्र कहता है कि उत्तर प्रदेश से मुंबई आने वाले प्रवासियों की संख्या 1961 में 12% थी जो 2001 में बढ़कर 24% हो गई। इसी अवधि में बिहार से आने वाले प्रवासियों की संख्या में और भी इजाफा हुआ और यह 1961 में सिर्फ 0.2% थी जो 2001 में बढ़कर 3.5% हो गई।

मुंबई में मराठी बोलने वाले लोग अभी भी सबसे बड़ा भाषी समूह हैं। इसके बाद हिंदी, उर्दू और गुजराती भाषा बोलने वाले लोग आते हैं लेकिन हालिया आंकड़े यह भी बताते हैं कि मराठी को अपनी मातृभाषा मानने वाले लोगों की संख्या मुंबई में कम हुई है। ठाणे और रायगढ़ के जिलों में हिंदी बोलने वालों की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। ठाणे में हिंदी बोलने वालों की संख्या में 80.45% बढ़ोतरी हुई जबकि रायगढ़ जिले में यह 87% तक पहुंच गई है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि देश के सबसे बड़े महानगर मुंबई में मराठी भाषा बोलने वालों की संख्या कम हो रही है और हिंदी भाषी लोगों की संख्या बढ़ रही है और इस वजह से मुंबई में सामाजिक और राजनीतिक बदलाव हो रहे हैं।

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