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बिहार में सत्ता का संग्राम: NDA के 225 सीटों के दावे का क्या है राज? टूट पाएगा 2010 का रिकार्ड, जानिए पूरी बात

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पटना

बिहार में विधानसभा चुनाव की चहल-पहल गति पकड़ती जा रही है। एनडीए और महागठबंधन के घटक दलों में सीटों का बंटवारा भले न तय हो पाया हो, लेकिन सीटें जीतने का लक्ष्य निर्धारित होने लगा है। इस मामले में महागठबंधन का लक्ष्य तो सामने नहीं आया है, लेकिन सरकार बनाने लायक सीटें जीत लेने का दावा तो वह कर ही रहा है। एनडीए ने जरूर जीतने वाली सीटों का लक्ष्य बता दिया है। पहले एनडीए ने 210 सीटों का लक्ष्य रखा था। दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों के ऐलान के बाद अब एनडीए का लक्ष्य अब बदल गया है।

एनडीए का लक्ष्य 225 सीटों का
एनडीए के नेता दावा कर रहे हैं कि विधानसभा चुनाव में 225 सीटें हर हाल में जीतेंगे। इसके लिए उनका समेकित प्रयास भी शुरू हो गया है। अभी जिलावार एनडीए के घटक दलों के नेता साझा कार्यक्रम कर रहे हैं। आगे इसे बूथ से राज्य स्तर तक ले जाने की तैयारी है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ कर एनडीए 2010 के रिकार्ड को तोड़ना चाहता है। तब एनडीए ने 206 सीटें जीती थीं। जेडीयू को 115 और भाजपा को 91 सीटें प्राप्त हुईं थीं।

तब बिहार एनडीए में भाजपा और जेडीयू दो ही दल शामिल थे। अभी एनडीए में छह दल शामिल हैं। पशुपति कुमार पारस की आरएलजेपी अगर अलग हो जाती है तो पांच दल बचेंगे। यानी एनडीए का दायरा बढ़ा है। एकता भी अटूट है। प्रयास साझा है। इसी आधार पर पर 225 सीटों का लक्ष्य एनडीए ने रखा है।

2020 में किसी तरह बहुमत
वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 74 सीटें जीतीं थीं। जेडीयू को 43 सीटें मिली थीं। जीतन राम मांझी की पार्टी हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) को चार और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) को चार सीटों पर जीत मिली थी। यानी कुल मिलाकर एनडीए ने बहुमत के 122 के आंकड़े से सात अतिरिक्त सीटों का बंदोबस्त किया था। इसमें चिराग पासवान के नेतृत्व वाली एलजेपीआर की एक सीट भी थी, जहां से जीतने वाले उम्मीदवार ने बाद में जेडीयू ज्वाइन कर ली थी। इसलिए एनडीए का 225 सीटें जीतने का लक्ष्य थोड़ा कठिन लगता है। खासकर तब, जब महागठबंधन पिछली बार बराबरी में मामूली अंतर से पीछे छूटा था ।

सीट शेयरिंग बड़ा संकट
एनडीए को लक्ष्य हासिल करने में पहला संकट सीट शेयरिंग का है। चिराग पासवान की पार्टी एलजेपीआर 70 सीटों का दावा कर रही है। जीतन राम मांझी की हम ने 40 सीटों पर तैयारी की बात कही है। हालांकि 20 सीटों पर मान जाने का आप्शन भी मांझी ने दिया है। इतनी सीटें न मिलने पर वे केंद्र का मंत्री पद भी छोड़ने की धमकी दे चुके हैं। हालांकि यह सबको पता है कि मांझी अपने स्टैंड पर कभी नहीं टिकते। आरएलएम के उपेंद्र कुशवाहा ने भले अपनी मांग नहीं बताई है, लेकिन अनुमान है कि वे भी आठ-दस सीटें तो चाहेंगे ही। जेडीयू और भाजपा 100-100 सीटों से कम पर शायद ही लड़ें। इसलिए सीट शेयरिंग एनडीए की बड़ी चुनौती है।

भाजपा को अपर हैंड
दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद भाजपा का अपर हैंड है। उसकी कोशिश होगी कि चुनाव में वह साथी दलों पर हावी रहे। चुनाव भले नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ने को तैयार हो जाए, पर एनडीए को सफलता मिलने पर इस बार भाजपा सरकार बनाने की कोशिश करेगी। भले यह नीतीश कुमार की सहमति से हो या दबाव डाल कर, पर भाजपा ऐसा करेगी ही। नीतीश कुमार के स्वास्थ्य और उम्र को लेकर यह बात सियासी गलियारे में खूब गूंज रही है।

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