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भारत में लोकतंत्र की जड़ें गहरी भीं, खतरे में भी… हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइकल सैंडल ने क्यों कही ऐसी बात?

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नई दिल्ली,

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2023 के पहले दिन के सत्र में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के फिलोसॉफी प्रोफेसर माइकल सैंडल ने कहा कि लिबरल एलीट वर्ग और मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों ने ऐसे लोगों के गुस्से और नाराजगी को नजरअंदाज किया है, जो लंबे समय तक यह समझते रहे कि उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप जैसे दुनियाभर के कई नेताओं ने इन लोगों की नाराजगी को समझा और उसे बखूबी भुनाया.

इस दौरान माइकल ने पहचान की राजनीति (Politics of Identity) पर बात करते हुए कहा कि असली सवाल यह है कि क्या पहचान की राजनीति बहुलतावादी होगी और उसमें बहस की गुंजाइश होगी? क्योंकि ऐसी स्थिति में पहचान की राजनीति सही मायने में वाजिब होगी वरना यह किसी भी देश के लिए बहुत खतरनाक है. जहां तक निजी स्वतंत्रता का सवाल है तो इसे होली ग्रेल (Holy Grail) की तरह होना चाहिए लेकिन इसके लिए दूसरी चिंताओं की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए.

उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण का दायरा संतुलित नहीं है. हम जानते हैं कि अमीर और गरीब के बीच की खाई बहुत बड़ी है. लेकिन सबसे बड़ी समस्या सफलता के प्रति बदलता नजरिया है. जो लोग शीर्ष पर पहुंच गए हैं, वे यह मानते हैं कि उनकी सफलता उनकी योग्यता का नतीजा है और वे सत्ता के लिए ही बने हैं या फिर अपने प्रयासों की वजह से शीर्ष तक पहुंचे हैं जबकि ऐसा नहीं है.

सैंडल ने कहा कि 1990 के दशक के दौरान एक तरह का आत्मविश्वास था कि अगर हम वैश्विक स्तर पर बाजारों को खुले ढंग से चलने दें तो सीमाओं के ज्यादा मायने नहीं रह जाएंगे. राष्ट्रीय पहचान का ज्यादा महत्व नहीं होगा और इस तरह हम परंपराओं, समुदायों, देशभक्ति के दायरे से ऊपर उठने में सक्षम होंगे.

सोशल मीडिया विनाशकारी है
प्रोफेसर सैंडल ने सोशल मीडिया मॉडल से जुड़ी समस्याओं का जिक्र करते हुए कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सनसनीखेज, भड़काऊ और उकसावे वाले कंटेंट से हमारा ध्यान खींचते हैं. यह बहुत खतरनाक है. यह हमारी सुनने और चीजों पर ध्यान देने की क्षमता के लिए विनाशकारी है क्योंकि पूरा इकोनॉमिक मॉडल हमारा ध्यान खींचने में लगा है. इसका पूरा आर्थिक मॉडल जितना हो सके, हमारा ध्यान खींचने में लगा है. हमारे निजी डेटा को इकट्ठा कर रहा है और उसके अनुसार विज्ञापनों के माध्यम से हमें प्रोडक्ट भी बेच रहा है.

भारत और अमेरिका में लोकतंत्र खतरे में
भारत में लोकतंत्र के भविष्य से जुड़े सवाल के बारे में पूछने पर प्रोफेसर ने कहा कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं लेकिन साथ में यहां साथ में लोकतंत्र खतरे में भी है. मैं एक ऐसे लोकतांत्रिक देश (अमेरिका) से आता हूं, जहां चुनाव के अगले दिन ही संसद की इमारत पर हमला हुआ था. इसलिए मुझे लगता है कि भारत और अमेरिका दोनों जगह लोकतंत्र खतरे में है. इतना ही नहीं दुनिया के कई देशों में भी यही स्थिति है, वहां लोकतंत्र खतरे में है.

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