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‘इस सरकार की सनक है…’ कर्तव्य पथ से इतिहासकार इरफान हबीब नाराज क्यों, राजपथ का समझाया मतलब

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नई दिल्ली

राजपथ का नाम कर्तव्य पथ करने से मशहूर इतिहासकार इरफान हबीब खुश नहीं हैं। उन्होंने शुक्रवार को कहा कि सड़कों या इमारतों का नाम बदलने से शासन नहीं बदलेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार इस संबंध में राजनीति कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक दिन पहले ही राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ किया था। इतिहासकार ने कहा कि इस सरकार को ऐसा कुछ करने की ‘सनक’ है जो यह छाप छोड़ सके कि यह एक ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया था जो एक ‘महान नेता’ था।

वे अपनी छाप छोड़ रहे…
उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा, ‘यह सब राजनीतिक है। इसे राजनीति कह सकते हैं, क्योंकि आप अपनी छाप छोड़ना चाहते हैं।’ हबीब ने कहा, ‘चूंकि आपको कोई खास नाम पसंद नहीं है’, इसलिए किसी चीज़ का नाम बदलने के लिए औपनिवेशिक इतिहास को मिटाने का हवाला देने का कोई तुक नहीं है। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक काल में किंग्स-वे और क्वींस-वे थे और आजादी के बाद एक का नाम राजपथ और दूसरे का जनपथ रखा गया।

गलत व्याख्या कर रहे
उन्होंने कहा, ‘मुझे ऐसा लगता है कि सोच-समझ कर गलत व्याख्या की जा रही है क्योंकि सरकार दिखाना चाहती है कि वह वर्तमान भारत को औपनिवेशिक भारत से अलग करने की कोशिश कर रही है, पर वास्तव में ऐसा नहीं है।’ उन्होंने कहा कि आजादी के बाद ही भारत ने औपनिवेशिक इतिहास को मिटा दिया। उन्होंने कहा कि राज का अर्थ शासन है, न कि ब्रिटिश राज और जन का अर्थ लोग है और इसीलिए राजपथ और जनपथ नाम रखे गए।

सड़क का नाम बदलने का कोई अर्थ नहीं
हबीब ने कहा कि भारतीय पहले ही जाग चुके हैं और वे चाहते हैं कि सरकार उनके कष्टों- आर्थिक, सामाजिक संघर्ष और देश में हो रही हर तरह की चीजों से अवगत हो। उन्होंने सड़कों और भवनों के नाम बदलने के बारे में कहा, ‘इसका कोई अर्थ नहीं है। शासन शायद ही बदलता है। किसी सड़क या इमारत का नाम बदलने से शासन नहीं बदलेगा। ऐसा कभी नहीं हुआ।’ उन्होंने कहा, ‘मूल बात यह है कि आप हर चीज पर अपनी छाप छोड़ना चाहते हैं। यह आपकी सनक, किसी की सनक, आज की सरकार की सनक या किसी अन्य सरकार की सनक हो सकती है।’

हबीब ने कहा कि नामों में बदलाव शायद ही किसी ऐतिहासिक विमर्श में फिट बैठता है। उन्होंने कहा, ‘यह सब काफी राजनीतिक है। यह सरकार कर रही है या पिछली सरकार ने किया। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि पिछली सरकारों ने जो किया, वह ठीक था। उन्होंने कई बड़ी गलतियां कीं। ज्यादातर राजनीतिक दल अपने वोट बैंक को लेकर चिंतित हैं। यह सरकार राष्ट्रवाद से ग्रस्त है। वे हर किसी को महान राष्ट्रवादी बनाना चाहते हैं, जैसे हम पहले राष्ट्रवादी नहीं थे।’

देशभक्ति और राष्ट्रवाद में अंतर है
मशहूर इतिहासकार ने आरोप लगाया कि जो लोग ‘अति-राष्ट्रवादी’ हैं, वे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नहीं दिखे थे। उन्होंने कहा कि देशभक्ति और राष्ट्रवाद के बीच अंतर करना होगा। उन्होंने कहा कि देशभक्ति अनिवार्य है और हर किसी को देशभक्त रहने की जरूरत है, लेकिन राष्ट्रवाद कुछ और है। हबीब ने कहा, ‘आज हमें देशभक्त, देश के प्रति निष्ठावान होने की जरूरत है। लेकिन अब हम राष्ट्रवादी बनने के लिए देश के भीतर ही दुश्मनों को ढूंढ रहे हैं और अपने ही लोगों को नक्सली और अति-नक्सली जैसे अलग-अलग नाम दे रहे हैं।’ उन्होंने कहा, ‘यह सब राजनीति है। मुझे इसमें कोई गंभीरता नहीं दिखती।’

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