नई दिल्ली
भारत इस महीने चीन को पछाड़कर दुनिया का सबसे बड़ी आबादी वाला देश बनने जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि अप्रैल खत्म होते-होते भारत की आबादी बढ़कर 1 अरब 42 करोड़ हो जाएगी। 2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत की 79.8 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की है। मुस्लिम आबादी के लिहाज से भारत, इंडोनेशिया और पाकिस्तान के बाद तीसरे नंबर पर आता है। एक वर्ग कहता है कि भारत की बढ़ती आबादी में मुसलमानों का सबसे बड़ा हाथ है। लेकिन सैयद मोहम्मद तल्हा को इस बात का फख्र है कि उनकी एक ही बेटी है। उनकी सात की बिटिया एक प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ती है। 42 वर्षीय तल्हा बिजनसमैन हैं और नोएडा में रहते हैं जबकि बेटी का मॉन्टेसरी स्कूल दिल्ली में है।
एक बच्ची से खुश हैं मो. तल्हा
वो कहते हैं कि 2.55 लाख रुपये की ऐनुअल फी भरने में उन्हें दिक्कत नहीं होती है बल्कि अच्छा लगता है। उन्होंने कहा कि अगर उनके दो बच्चे होते तो वो उन्हें इतने बड़े स्कूल में नहीं भेज पाते। उन्होंने कहा, ‘एक बच्चा होने से हम पूरा ध्यान उसी पर रख पाते हैं। उसे अच्छी तालीम के साथ-साथ अन्य कई सुविधाएं देते हैं। एक बच्चा होने के बहुत फायदे हैं।’ भारत के मुस्लिम परिवारों में तल्हा जैसी भावना जोर पकड़ रही है।
जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों की सफलता
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने छह मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं के साथ-साथ मुस्लिम नेताओं, इस्लाम के जानकारों और जनसंख्या विशेषज्ञों से बात की। सभी ने माना कि भारत के मुसलमानों में परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के प्रति चेतना पैदा हुई है। 14.2 प्रतिशत की साझेदारी के साथ मुसलमानों की भारत में दूसरी सबसे बड़ी आबादी है। हालांकि, देश में दशकों से जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। फिर भी दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बनने की कगार पर पहुंचने को इन कार्यक्रमों की असफलता कह सकते हैं, लेकिन दूसरी तरफ मुसलमानों में छोटा परिवार रखने की समझ पैदा होना इनकी सफलता मानी जा सकती है। एक्सपर्ट्स भी कहते हैं कि जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम भारत में बहुत हद तक कारगर साबित हुए। इस कारण यहां जनसंख्या स्थिरता आई है।
मुसलमानों में घट रही है प्रजनन दर
मुसलमानों में छोटे परिवार रखने का बढ़ता चलन राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) में भी दिखा। सर्वे के मुताबिक, बीते 15 वर्षों में मुसलमानों में जन्म दर लगातार घट रही है। सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि 2005-06 में प्रत्येक मुस्लिम महिला औसतन 3.4 बच्चे पैदा करती थी। यह आंकड़ा 2015-16 में घटकर 2.6 और 2019-21 में और घटकर 2.4 रह गया है। हालांकि, भारत के किसी भी दूसरे समुदाय के मुकाबले मुस्लिम महिलाओं की प्रजनन दर अब भी ज्यादा है। अच्छी बात यह है कि मुसलमानों में बच्चा पैदा करने दर में गिरावट भी तेज है। 1992-93 में प्रति मुस्लिम महिला 4.4 की औसत से बच्चे पैदा होते थे।
मुस्लिम धार्मिक नेता भी निभा रहे भूमिका
इससे भी ज्यादा अच्छी बात यह है कि मुसलमानों में जनसंख्या नियंत्रण के प्रति जागरूकता की मशाल उनके धार्मिक नेता ही जला रहे हैं। लखनऊ ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद राशीद कहते हैं, ‘मुसलमानों में एक अफवाह फैली है कि इस्लाम में परिवार नियोजन की इजाजत नहीं है।’ वो कहते हैं कि शरीयत में परिवार नियोजन के बारे में बात है। उन्होंने कहा, ‘हमारी जिम्मेदारी है कि इन अफवाहों पर दूध का दूध और पानी का पानी करें। हमने जागरूकता कार्यक्रम चलाए, लोगों से अपील की, ऐसे मुद्दों पर शरीयत के आदेशों के बारे में बात की।’
बदल रहा है मुस्लिम समुदाय का मिजाज
हालांकि, एक्सपर्ट्स इन प्रयासों के नाकाफी मानते हैं। वो कहते हैं कि गरीब मुसलमानों में जागरूकता की अब भी घोर कमी है। बिहार में सरकारी स्वास्थ्यकर्मियों को इसकी जिम्मेदारी दी गई है। वो मस्जिदों में स्थानीय मुस्लिम नेताओं से बात करते हैं और जनसंख्या नियंत्रण को लेकर जागरूकता बढ़ाने में मदद की अपील करते हैं। हालांकि, नतीजे उत्साहजनक नहीं हैं। किशनगंज में अल अजहर मस्जिद के रखवाले अहमद दैकुंध कहते हैं, ‘इस्लाम भरे-पूरे परिवार की बात करता है और यह लोगों पर निर्भर है कि वो कितने बच्चे चाहते हैं।’ इलाके के मुस्लिम परिवारों में प्रजनन दर अधिक है। वैसे दैकुंध का कहना है कि उनकी पीढ़ी के लोग पहले के मुकाबले कम बच्चे पैदा कर रहे हैं। वो कहते हैं, ‘हम सात भाई-बहन है, लेकिन हम सबके चार-चार बच्चे ही हैं।’
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में शाहिद परवेज का धनी परिवार है। शाहिद छह भाई-बहन हैं। लेकिन उनके दो बेटे और एक बेटी ही हैं। वो कहते हैं कि उनके बच्चों ने ऊंची तालीम हासिल की है। 65 वर्षीय शाहिद की बेटी मुनीजा दिल्ली में टीचर हैं। उनकी शादी हो गई है, लेकिन तुरंत बच्चा पैदा करने की प्लानिंग नहीं है। वो कहती हैं, ‘हम थोड़ा अपने लिए भी जीना चाहते हैं।’
